भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 442 में से

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पृष्ठ 390

ൡ श्रीकालिका पुराण ൡ ३९३ वाराणसी में भगवान् शिव की आराधना की । भगवान् शिव परम प्रसन्न हो गए थे और अभीष्ट वरदान उसे दे दिया था । उसने भी भगवान् शम्भु से अपने अभीष्ट तीन वरदान प्राप्त किए थे । जब तक भगवान् भास्कर रहें तभी तक मेरी सन्तति स्थित रहेगी, इसी नगरी में मेरे ही वंश की राजता रहे । मेरे वंश पर आप नित्य ही परम प्रसन्न रहेंगे । इन वरों को प्राप्त करके महान् देवसेन ने ही भगवान् शंकर की प्रसन्नता से उस पुरी का चिरकाल तक उपभोग किया । देवसेन ने केशिनी के उदर से पुत्रों को जन्म ग्रहण कराया । अब आप लोग उन सातों के नामों का श्रवण कीजिए जो कि कीर्तित किए जा रहे हैं । सुमना, वसुदान, ऋतुधृक्, यवन, कृती, नील, विवेक, ये सात पुत्र थे जो समस्त शास्त्रों के विशारद थे । इसके अनन्तर समय पर देवसेन भी भार्या के सहित अपने पुत्रों पर राज्य का भार डालकर विद्याधर क्षय को चला गया था । इसके उपरान्त उसके पुत्र समुत्पन्न हुए थे । ये सभी शास्त्रों के अर्थ के पारगामी विद्वान् थे । उनके नाम सुमति, विरूप और सत्य थे । सुमति की कन्या और सत्य का पुत्र डिण्डिम हुआ था । विरूप का गाधि हुआ और गाधि का सुतमित्र नामक हुआ था । उसका राजा कल्प से विजय हुआ था जिसने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर बहुत तेज वाले राजाओं का शक्र की अनुमति से सौ योजन का खण्डन किया था । जिसको सत्यसाची अर्जुन ने जो पाण्डु का प्रतापी पुत्र था, दग्ध कर दिया था। ऋषियों ने कहा-उसने भी योजन वाले खाण्डव वन को विजय किस तरह से किया था । इसको हम श्रवण करना चाहते हैं । हे तप के ही धन वाले! इसका आप वर्णन कीजिए । महर्षि मार्कण्डेय ने कहा-चन्द्रवंश से एक महान् बल और पराक्रम वाला, देखने में सुन्दर नाम वाला चारु रूप से संयुक्त और प्रताप वाला राजा हुआ था । उसने हिमवान् पर्वत के समीप में ही महान् वन को भंग करके सिंहों और व्याघ्रों को निकाल कर और कहीं पर तपस्वियों को भी हराकर साण्डवी नाम वाली परम शोभन नगरी का निर्माण किया था । वह तीस

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