कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३९४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ योजन विस्तार वाली थी और सौ योजन आयत की थी । उसकी चहार दीवारी उच्च थी और अट्टाल एवं अम्बुद तोरणों वाली थी । निम्न और अतीव दीर्घ परिघाओं ( खाई से समावृत थी ) । उसमें अनेक मनुष्य रहते थे और वह शत्रु वीरों से घृष्यमाण नहीं थी । उसमें बड़े-बड़े उपवन थे तथा बहुत सी अप्सराओं से समाकीर्ण थी । उसमें बहुत से आरामगाह ( उद्यान ) थे तथा उत्तम श्रेणी के मनुष्य निवास किया करते थे । जहाँ पर निरन्तर मनुष्य उत्सवों से समन्वित रहा करते थे जो दिवलों में स्थित देवगणों के साथ स्पर्धा किया करते थे । वहाँ के मनुष्य आनन्द से युक्त आद्य और भोगों से संयुत थे । उस सुदर्शन नाम वाले राजा ने भूमि का खनन और विदारण किया था । उसने गंगादेवी खाण्डवी का वहन कराया था । उसके द्वारा खोदे हुए मार्गों से खाण्डवी के मध्य को संप्लावित करके वक्रा और अनुवक्रा होकर सीता नदी की ओर वह जाया करती है । उसने समस्त युद्धों को जीतकर और बहुत-सा धन का आहरण किया था । उसने खाण्डवी को मध्य में अनेक प्रकार के रत्नों के द्वारा वश में कर लिया था । उस सुदर्शन नृप ने अन्यों के नगरों से मनुष्यों को वहाँ लाकर खाण्डवीं में हठ से भी निवासी बना दिया था । उस कृती ने देव, दानव और गन्धवों को युद्ध से जीत जीतकर देववृक्ष, देवरत्न, देवी और औषधियों को उस भूपाल सुदर्शन ने खाण्डवी में रोपित किया था । भगवान् विष्णु ने उस नृप सुदर्शन का उपचार किया था और प्रायःदेवों का तथा मनुष्यों का जयशाली वाराणसी के स्वामी विजय को कुत साचिव्य को युद्ध के लिए उसके बैर में योजित किया था । महान् बल और पराक्रम वाले विजय ने विवर की प्राप्ति करके नृप सुदर्शन का अबस्कन्द किया था । उस सुदर्शन ने विजय के अबस्कन्द को सहन किया था और चतुरंगिणी सेना से शीघ्र ही युद्ध सम्मुख हुआ था । फिर महात्मा विजय के साथ महान् युद्ध हुआ था । सुदर्शन का सेनानी जिसका नाम रुमणवान था जो बहुत अधिक वीर्यवान था । वह सोने के रथ पर सवार होकर विजय के सम्मुख हुआ