भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 442 में से

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पृष्ठ 395

ൠൠ श्रीकालिका पुराण ൠൠ ३९९ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ राशिभूत सुवर्णों की तथा रत्नों के ढेरों को बहुत तादाद में देखा था । वहाँ पर खिले हुए कमलों वाले सरोवरों को देखा था । जो हंसों के नाद से सभी ओर से युक्त थे । पर्वतों के ही समान सुवर्ण और रत्नों के ढेरों को देखा था, घूमते हुए भौरों से विभूषित और पुष्पित देव वृक्षों को देखा था जो प्रस्फुट और सुन्दर गन्ध से युक्त प्रत्येक घर में व्यवस्थित थे । शत्रुओं का हनन करने वाली विजय से राजा के नेत्र प्रफुल्लित हो गए थे । उसने उस नगरी को भूमि पर समागत अमरावती ही माना था । उस परम सुन्दर नगरी को देखते हुए राजा के पास सुरेश्वर ने आकर परम तीक्ष्ण वाणी से उसको सान्त्वना देते हुए विजय से कहा था । इन्द्रदेव ने कहा- हे राजन्! यह महावन देवगणों से समावृत था । यह गन्धर्व, यक्ष और मुनियों से समावृत और परम मनोहर था । राजा सुदर्शन ने देव आदि सबको यहाँ से उत्सारित करके मेरे अप्रिय कार्य करने में रत होता हुआ उसने इन वन का भंग करके गुह्य तपोधन को उत्साहित करके राजा ने हठ से खाण्डवी नगरी की रचना की थी । हे नरोत्तम! आप पुनः इसको उत्तम वन बना दीजिए । वहाँ पर मैं तक्षक के साथ एकान्त में विहार करूँगा । यह आपके प्रसाद से मुनिगणों के तपश्चर्या करने का अनुपम स्थान होगा । हे पार्थिव! यह यक्षों का और किन्नरों का भी उत्तम स्थान हो जायगा । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-उस समय इन्द्रदेव के इस वचन को विजय ने श्रवण करके इन्द्रदेव के गौरव से उस खाण्डवी नगरी को विस्तृत वन ही बना दिया था । समस्त प्रजाजन अपनी इच्छा के अनुसार यथास्थान गमन कर जायें । जिन लोगों की पुनः मेरे राज्य में गमन करने की इच्छा होवे वे वाराणसी में गमन कर जावें जो कि मेरे द्वारा ही प्रतिपादित पुरी है । इसके उपरान्त मनुष्यों ने उसके वचन का श्रवण किया और कुछ लोग अपने ही स्थान को गमन कर गए । और कुछ लोग विजय नृप के द्वारा अभिपालिता वाराणसी में चले गए । इसके अनन्तर धनों की तथा रत्नों की तथा राशियों को अलग-अलग और

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