भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 442 में से

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पृष्ठ 396

४०० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ मणियों, कनकों और पुरुषों की राशियों को विजन ने अंक साधनों के द्वारा वाराणसी नगरी की ही ओर वारित करा दिया था । विजय ने तुरन्त ही तीस योजन विस्तीर्ण एवं सौ योजन आयत उस पुरी को वन बना दिया था । उस वन में इन्द्रदेव की सम्मत्ति से अपने गणों के साथ तक्षक ने निवास किया था । वहाँ पर तक्षक बहुत समय तक रहा था और फिर वह निर्धन बन गया था । वहाँ पर गन्धर्वों के साथ देवगण और अप्सराओं के समुदाय आनन्द की क्रीड़ा किया करते हैं । वे सब युद्धों में विजय प्रदान करने वाले विजय की चर्चा किया करते हैं । अट्ठाईसवाँ युग के प्राप्त होने पर द्वापर के शेष में वह्नि ने विष्णु से ब्राह्मण के रूप से भिक्षा की याचना की थी । पाण्डु के सुत द्वारा भिक्षा देने की स्वीकृति दे दी गई थी । वह्नि ने अपने स्वरूप में स्थित होकर विष्णु से यह वचन कहा था, हे पाण्डु पुत्र! मैं अग्नि हूँ, यज्ञ भागों के अभिभाजन से मैं व्याधित हो रहा हूँ । अब आप ही मेरी व्याधि का विनाश कीजिए । खाण्डव नाम वाला विपिन है जो पक्षी-मृग और राक्षसों से समन्वित है । हे श्वेत वाहन! यदि आप मुझको भोजन कराने में समर्थ है तभी मेरी यह व्याधि शीघ्र ही नष्ट हो जायगी । पहले समय में विजय नाम वाले नृप ने खाण्डवी नाम की उस पुरी को भंग करके इसको वन बना दिया था । इसी कारण से यह खाण्डव वन है । हे श्वेत वाहन! वह देवों के द्वारा विहित वन मेरे ही लिए था । इन्द्रदेव के विरोध से मैं स्वयं इसका भोग करने का उत्साह नहीं करता हूँ । हे महाभाग! इसी कारण से आप परित्राण करिए और उस वन में नियोजन कीजिए । जिस रीति से मैं सम्पूर्ण का भोग करने के लिए आपके प्रसाद से मैं समर्थ हो सकता हूँ । महान् बलवान् सव्यसाची ने उसके इस वचन का श्रवण करके उस सम्पूर्ण वन को जो कि प्राणियों से समन्वित था, दग्ध कर दिया था । यह देवकी के आत्मज भगवान् वासुदेव के द्वारा पालित है । अग्नि के हित करने से रति रखने वाले ने उस खाण्डव वन को जला दिया था । परम प्रसन्न होकर वह्नि ने इसी कारण से महात्मा अर्जुन को