कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ प्रतिमाओं में देने के लिए जो भी योग्य हो वह तनु में देना चाहिए । पौष्य जो होता है वह पुष्यों के समुदाय से रचित हुआ करता है और कुश तथा सूत्र आदि से संयुक्त होता है । हे भैरव ? यह देवी का, मेरा और समुद्भूत आसन मसृण और शुभ हुआ करता है । आसन के प्रकार और भेद आसन ऐसा होना चाहिए जो बहुत ऊँचा न हो, न बहुत विस्तृत होना चाहिए । ऐसे ही आसन को निवियोजित करे । अन्य लकड़ी से बनाया हुआ भी उत्तम देवे । वह आसन दारु (काष्ठ) के सार रहित तथा काँटों से युक्त एवं क्षीर से संयुक्त, चैत्य शमशान से समुत्पन्न और विभीतक को छोड़कर ही काष्ठ का आसन बनाना चाहिए । वस्त्र के आसन के लिए वल्कल (वृक्ष की छाल), कोषज और शाण अर्थात्, ये ही तीन आसन माने गए हैं । रोमज अर्थात् रोमों से बनाया हुआ कम्बल, ये चार होते हैं । अपने इष्टदेव की मूर्ति के लिए इसके द्वारा विरचित आसन ही देना चाहिए । सिंह, व्याघ्र, तीक्षण, छाग, महिष, गज, तुरंग, कृष्णास्मर, ये मृगों के नौ भेद हैं । इनके चर्मों के द्वारा आसन बनाया जाया करता है जो सभी देवों के लिए हुआ करता है । चर्म के आसन में तुरंग के चर्म का आसन श्रेष्ठ होता है तथा काष्ठ के आसनों में चन्दन का श्रेष्ठ माना गया है । सभी देवों का संयुत आत्म वाले ऋषियों का योगपीठ के सदृश आसन तथा स्थान कहा जाता है । देवों के लिए आसन के समर्पण से परम सौभाग्य और मुक्ति की प्राप्ति की जाया करती है । मृग नौ प्रकार के माने गए हैं । अर्थात् निम्नांकित इनके नौ भेद होते हैं, शम्बर, रोहित, राम, न्यंक, अंकु, शशा, रूरू, राण और हिरण, ये नौ भेद हैं । हे भैरव! हरिण भी यहाँ पर पाँच भेदों वाला समझना चाहिए । ऋष्य, शृंग, रूरू, पृषत, तथा मृग, ये बलि के प्रदान करने में तथा चर्म दान में कीर्त्तित किए गए हैं । धातु के आसनों में केवल लौह को छोड़कर काँसा, सीमा, शिलामय, मणिमय, ये रत्नमय माने गये हैं । देवताओं के लिए आसन मुक्ति