भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 442 में से

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पृष्ठ 399

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४०३ अर्थात् साँसारिक सुखों के उपभोग और मुक्ति अर्थात् साँसारिक बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए उपभोग और समुत्सृजित करना चाहिए । हे भैरव! और यहाँ पर ही साधना करने वालों के आसनों के विषय में भी श्रवण कर लीजिए । जिन पर बैठकर अभ्यर्चन करता हुआ सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लिया करता है । साधकों के लिए चार प्रकार के आसन निरन्तर बताये गए हैं, ऐन्धन ( काष्ठक ), चार्मण, ( चमक ), वास्त्र ( वस्त्र का ), और तेजस अर्थात् धातु निर्मित ये चार हैं । साधक को पूजा के कर्म में वे सभी आसन प्रशस्त होते हैं । बुध पुरुष को चाहिए कि सर्वदा काष्ठ आदि का आसन ही रखे । काष्ठ का आसन चौबीस अंगुल प्रमाण वाला दीर्घ होना चाहिए, यही शास्त्र सम्मत होता है । सोलह अंगुल के विस्तार से युक्त और चार अंगुल ऊँचाई वाला होना चाहिए, अथवा छः अंगुल ऊँचा करे । इससे ऊँचा कभी न करे । आसन दो हाथ से बड़ा नहीं होना चाहिए और डेढ़ हाथ से अधिक विस्तृत नहीं हो । तीन. अंगुल से ऊँचा आसन कभी भी पूजा के कर्म में संश्रित करना चाहिए । चर्म का आसन जितना भी अभीष्ट हो करे । पूर्व में वर्णित आसन सिद्धि का प्रदान करने वाला हुआ करता है । छः अंगुल से ऊँचा कभी भी नहीं करना चाहिए । कम्बल का आसन तथा चर्म का आसन और शैल अर्थात् शिला का आसन महामाया के प्रकृष्ट पूजन में परम प्रशस्त आसन कहा गया है तथा कामाख्या देवी के पूजन में इसी को श्रेष्ठ बताया गया है तथा देवी के पूजन में और भगवान् विष्णु के अर्चन में भी कुशा, आसन प्रशस्त माना गया है । बहुत दीर्घ, बहुत ऊँचा और बहुत विस्तार वाला काष्ठ और भूमि के समान ही कहा गया है और पाषाण का भी आसन सभी कर्मों में प्रशस्त होता है । द्वार में बाहर आसन पृथक्-पृथक् ही कल्पित करे । पत्रों का आसन कभी पूजन में प्रयोग नहीं करना चाहिए । गज को छोड़कर किसी भी प्राणी के अंग से निर्मित आसन तथा अस्थियों से रचित आसन ग्रहण नहीं करे । मातंग के दाँतों से निर्मित आसन कामिक कर्मों में समाचरित करना चाहिए । गजचर्म का आसन