कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०९ श्रीकालिका पुराण ६०९ ४१३ में संस्थित देवता का ध्यान करके और वायु के द्वारा बाहर करके मण्डल में आरेहण करके विधि के अनुसार उपचारों को देना चाहिए । अंगों का पूजन करके उसी भाँति दल देवताओं का यजन करे । फिर तीन पुष्पांजलियों को देकर, जप करके, स्तवन करके और प्रणाम करे । देवता के सामने मुद्रा को प्रदर्शित करके पीछे विसर्जन करना चाहिए । सभी देवताओं की यह ही विधि कही गई है । यदि कल्प में कही हुई पूजा भली भाँति नहीं की जा सकती है तो उपचारों को उस भाँति देने के लिए उस समय में इन पाँचों को सदा वितरित करे । गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्य, ये पाँच हैं । अभाव में पुष्प और दीप के द्वारा करे, इनके भी अभाव में भक्ति की भावना से ही करना चाहिए । यह संक्षेप पूजा कह दी गई है । दीप पूजा का विधान हे भैरव! पुरश्चरण के कृत्य में प्रदीप के विषय में आप श्रवण कीजिए । दीप को तेजोमय बताया गया है । यह दीप चारों वर्गों के प्रदान करने वाला हुआ करता है इस कारण से दीपों के द्वारा श्री के ऊपर जप प्राप्त करना चाहिए । जो पुरुष निरन्तर ही पुष्पों और दीपों के द्वारा देवता का अर्चन किया करता है । इन दोनों ही से चारों वर्गों की प्राप्ति कही गयी है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । पुष्पों में रहने वाली परम ज्योति है अतएव पुष्प से ही प्रसन्न होती है । तीन वर्गों का अर्थात् धर्म, अर्थ, और काम का साधन हैं । यह पुष्प तुष्टि, पुष्टि और मोक्ष प्रदान करने वाला है । पुष्प के मूल में ब्रह्माजी रहा करते हैं और पुष्प के मध्य में केशव का निवास है । पुष्प के अग्रभाग में महादेवजी विराजमान रहा करते हैं और सभी देवगण दल में संस्थित रहते हैं । इस कारण से पुष्पों के द्वारा देवों का यजन करना चाहिए और भक्ति की भावना से संयुत होकर नित्य ही अर्चन करे । नाममात्र का उच्चारण करना सब विभूति के लिए होता है । अब दीपक के भेदों के विषय में बताया जाता है,