भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 442 में से

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पृष्ठ 412

४१६ श्रीकालिका पुराण दिए गए काष्ठ अथवा पराग का जिसका धूप ताप रहित हो वह धूप देवगणों की तुष्टि के देने वाला होता हैं, ऐसा जान लेना चाहिए । उन द्रव्यों को सबको एक समूह में एकत्रित करके परिधूपित नहीं करे । तुषाग्नि से वर्त्तुन करके धूप न दे । ऐसा करने से धूप देने का जो भी कुछ फल हुआ करता है वह कभी भी प्राप्त नहीं होता है । जब उसका कोई भी फल नहीं है तो वैसा न करें । अब यह बताया जाता है किन-किन वृक्षों को धूप के लिए ग्रहण करना चाहिए । श्री चन्दन, सरल शाल तथा कृष्ण गुरु, उदय, सुरथ, स्कन्द, काशल, नमेरु, नेदेव दारु, विम्बसार, खादिर, सन्तान, पारिजात, हरिचन्दन, वल्लभ, इन वृक्षों की धूप सभी देवों के लिए प्रीति देने वाली परिकीर्तित की गई है । सूत्र के साथ अराल, श्री बास, पट्ट वासक, कर्पूर, श्रीकर, पराग, श्रीहर, आमल, सर्वोषधीय, जातीय वराह, चूर्ण, उत्कल, जाती कोप का चूर्ण, गन्ध, कस्तूरिका, क्षोद वृत्त में कही हुई ये उदाहृत हैं । यक्ष धूप, वृक्ष धूप, श्रीपिटट, अगुर, झर्झर, हवि, वाहा, पिण्डधूप, रुगोल, दण्ठ, अन्योन्य योग, निर्यास, ये धूप कीर्तित किए गए हैं । इन धूपों के द्वारा देवों को धूपित करना चाहिए । जिनकी धूपों से उद्भूत घ्राणों के द्वारा जन्तुगण तुष्टि को प्राप्त हुआ करते हैं । निर्यास, परांग, काष्ठ, गन्ध और कृत्रिम, ये पाँच धूप परम प्रीति के करने वाला हुआ करते हैं । भगवान् माधव प्रभु के लिए किसी भी समय में यक्ष धूप का वितरण नहीं करना चाहिए । मेरे लिए रक्त विद्रुम तथा सुरथ, कद्रिल का भी वितरण न करे । यक्ष धूप, पुत्र बाद, पिण्ड धूप, सुगोलक, कृष्णा गुरु, कपूर से युक्त, यह महामाया का प्रिय धूप कहा गया है । वृक धूप द्वारा महामाया देवी का प्रकृष्ट पूजन करना चाहिए । जो धूप में मेद और मज्जा से समायुक्त हों उनका विनियोग कभी भी नहीं करना चाहिए । परकीय अर्थात् दूसरों के आघ्रात अर्थात् जिनका घ्राण कर लिया गया हो, कृत्या से अभिमर्दित पुष्प, धूप और गन्ध को तथा दूसरे भी उपचारों को घ्राण करके जो