कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें൰०४ श्रीकालिका पुराण ൰०४ ४१७ देवगणों के लिए समर्पित किया करता है वह मनुष्य घोर नरक में प्राप्त हुआ करता है । धूप को कभी आसन पर तथा घट पर वितरण नहीं करना चाहिए । जैसा-जैसा भी कोई आधार बनाकर ही उनको विनवेदित करना चाहिए । रक्त विद्रुम, शाल, सुरथ, सुरल, सन्तानक, नमेरु, काला गुरु से समन्वित, जाती से संयुक्त धूप कामेश्वरी को प्रिय हुआ करता है । हे पुत्र! उसी भाँति यह त्रिपुण्या को तथा नित्य ही मातृकाओं को और समस्त पीठदेवों को और रुद्र आदि को भी प्रिय हुआ करता है । धूप हमने आपको बता दिया है । अब नेत्रों के अञ्जन के विषय में आप श्रवण करिए जिसके द्वारा कामाख्या देवी त्रिपुरा देवी वैष्णवी देवी परम प्रसन्न हुआ करती हैं । अञ्जन छः प्रकार के हुआ करते हैं उनके नाम ये हैं-सौवीर, यामुन, तुत्य, मयूरयामुन, दूर्विका, मेघनील, ये छः होते हैं । ये घिसे हुए ग्रहण करने के योग्य होते हैं । चाहे शिला पर घिसे हुए हों या किसी उत्तम धातु पर घृष्ट किए गए हों । हे पुत्र! यह सभी देवों के लिए समर्पित करे और सभी देवियों की सेवा में निवेदित करना चाहिए । धृत और तैल आदि के योग्य से ताम्र आदि पर दीपक की अग्नि के द्वारा जो अञ्जन बनाया जाता है वही दर्विका कहा गया है । यदि सबका अभाव हो तो देवियों की सेवा में इस दाह से समुत्पन्न अञ्जन को ही समर्पित करना चाहिए । महामाया देवी, जगत् की धात्री कामाख्या देवी तथा त्रिपुरा देवी इन उपर्युक्त छः प्रकार के अञ्जनों से जब ये निवेदित किए गए हों तो सदा ही महान तोष को प्राप्त हुआ करती है अर्थात् उनको परमाधिक प्रसन्नता इनको हुआ करती है । महामाया के लिए प्रस्तुत इस उत्तम अंजन को विधवा नारी को कभी अपने उपयोग में नहीं लेनी चाहिए । इसका तात्पर्य यही है कि विधवा नारी के द्वारा यह अंजन नहीं बनाया जाना चाहिए । वैष्णवी देवी कभी भी विधवा नारी के द्वारा तैयार किया अञ्जन स्वीकार नहीं करती हैं । साधना करने वाले को चाहिए कि मिट्टी के