भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 414

४१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पात्र में विहित अञ्जन को निवेदित करने से पूजा के फल की भी प्राप्ति कभी नहीं हुआ करती है । ऐसा अञ्जन नहीं देना चाहिए क्योंकि जब इस अञ्जन को देवी स्वीकार ही नहीं किया करती है तो वह पूजा अधूरी होकर निष्फल हो जाया करती है । धूप और नेत्र अञ्जन इन दोनों का ही देवगणों के लिए भक्ति की भावना द्वारा मनुष्य को समर्पण करना चाहिए । इस प्रकार से हमने आप दोनों के समक्ष धूप और नेत्र अंजन इन दोनों को बता दिया है । अब एकाग्र मन वाले होकर महादेवी के लिए जो भी नैवेद्य समर्पित करना चाहिए उसके विषय में श्रवण करिए । प्रदक्षिणा और प्रणाम निर्णय श्री भगवान् ने कहा-दक्षिण हाथ को प्रसारित करके फिर स्वयं नग्न शिर वाला हो और दाहिने पार्श्व को दर्शित करता हुआ एक बार अथवा तीन बार वेष्टित करें । इसके करने से देवी को प्रीति हुआ करती है । और जो एक सौ आठ बार देवी की प्रदक्षिणा किया करता है वह पुरुष अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त करके पीछे अन्त समय में मोक्ष की प्राप्ति का लाभ किया करता है । जो मन से भी भक्ति की भावना से देवी के लिए प्रदक्षिणा (परिक्रमा) दिया करता है वह इस प्रदक्षिणा के ही पुण्य-प्रभाव से ही यमराज गृह में अर्थात् समय पुरी में जाकर नरकों को कभी नहीं देखा करता है । नमस्कार भी काया से होने वाला, वाणी के द्वारा समुत्पन्न हुआ और मन से किया हुआ तीन प्रकार का हुआ करता है । जो उसके ज्ञान रखने वालों के द्वारा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार का सुना गया है । इस नमस्कार करने का भी उक्त तीनों श्रेणियों में करने का क्रम है । जो अपने दोनों हाथों को और पैरों को फैलाकर भूमि में एक दण्ड की भाँति गिरकर अपने घुटनों से भूमि में जाकर शिर से फिर भूमि गमन करके अर्थात् शिर से भूमि का स्पर्श करके नमस्कार अपने आठों अंगों के सहित किया जाता है वही उत्तम नमस्कार होता है । जो काया के ही द्वारा किया