भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 442 में से

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पृष्ठ 415

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४९९ जाया करता है, इसी को कायिक कहा गया है । जो अपने घुटनों से भूमि का स्पर्श करके और शिर से पृथ्वी का स्पर्श करके किया जाता है वह नमस्कार मध्यम श्रेणी कायिक कहा गया है । जो अपने दोनों करों को जोड़ कर किसी प्रकार से अपने शिर में ही लगाकर नमस्कार किया जाता है और जिसमें घुटनों और मस्तक को भूमि में स्पर्श नहीं करके ही किया जाता है वह नमस्कार अधम कोटि का कहा जाया करता है । ये तीन तरह के नमस्कार काया से किए जाने वाले होते हैं तथा जो नमस्कार गद्य तथा पद्य के द्वारा घटित करके किया जाता है और भक्ति की भावना से होता है वह वाचिक अर्थात् वाणी के द्वारा किए जाने वाले उत्तम श्रेणी का नमस्कार किया जाया करता है वह सदा ही वाणी के द्वारा किया हुआ मध्यम कोटि का नमस्कार होता है और जो मनुष्य के वाक्य के ही द्वारा सदा नमस्कार किया जाता है । हे पुत्रों! वह वाणी से ही किया हुआ अधम श्रेणी वाला नमस्कार समझना चाहिए । मन के द्वारा भी किया हुआ नमस्कार उत्तम, मध्यम और अधम ये तीन प्रकार का कहा गया है । जो मन को पूर्णतया संलग्न करके किया जावे तथा आधे मन से केवल खाना पूरी ही की जावे अथवा मन को इष्टवत न करके ही किया जाया करता है ये तीन प्रकारों वाला अर्थात् उत्तम, मध्यम और अधम मानस नमस्कार होता है । इन तीनों प्रकार के नमस्कारों में कायिक अर्थात् शरीर के द्वारा किए जाने वाला नमस्कार ही उत्तम होता है । कायिक नमस्कारों से ही देवगण नित्य परम प्रसन्न हुआ करते हैं । यह ही नमस्कार जो दण्ड आदि के द्वारा प्रतिनामों से पूर्व में प्रतिपादित किया गया है उसी को प्रणाम जान लेना चाहिए ।

◯ नैवेद्य अर्पण

नैवेद्य के द्वारा सभी कुछ होता है और नैवेद्य से अमृत होता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों परम पुरुषार्थ नैवेद्यों में ही प्रतिष्ठित रहा करते हैं । नैवेद्य नित्य ही समस्त यज्ञों से परिपूर्ण होता