कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पूजन विधि-इन देवियों में पूजन में यह विशेषता है कि यन्त्र के भूपुर में इन्द्रादि दिक्पाल तथा वज्रादि अस्त्रं, भूपुर के चतुर्द्वार में विष्णु, शिव, सूर्य और गणेश; भूगृह में लोकपाल, बाह्य में देवी के अस्त्र तथा भूपुर के चारों ओर पूर्वादि क्रम से विष्णु, शिव, सूर्य और गणेश का पूजन करना चाहिए । इसी प्रकार यन्त्र में ही गुह्यकाली, भद्रकाली, श्मशान काली-इन चारों देवियों का पूजन करना चाहिए । इनका यन्त्र सम्बन्धी कोई भेद नहीं है । सबके यन्त्र एक समान हैं । इनके यन्त्र का स्वरूप नीचे बताया गया है । यन्त्र का स्वरूप-उक्त चारों देवियों में यन्त्र को अंकित करने की विधि यह है कि पहले त्रिकोण, फिर षट्कोण तथा नवकोण अंकित करके उसके बाहर तीन वृत्त तथा केशर सहित अष्टदल पद्म अंकित करे । फिर तीन भूपुर वाला एक चुरस्त्रद्वार संयुक्त योनि मण्डल का स्वरूप अंकित करना चाहिए । यह 'त्रिपञ्चार यन्त्र' सब यन्त्रों से प्रसिद्ध हैं । 卐 ॐ 卐 गुह्य काली के मन्त्र अब 'गुह्यकाली' के मन्त्र तथा पूजा-प्रणाली का वर्णन किया जाता है । यह महाविद्या त्रिभुवन में अत्यन्त दुर्लभ तथा धर्मार्थ काम मोक्ष को देने वाली, महापापों को नष्ट करने वाली, समस्त सिद्धियों की प्रदाता, सनातनी तथा भोग को देने वाली प्रसिद्ध है । क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । नाम-भेद से यह मन्त्र गुह्यकाली तथा दक्षिणा काली दोनों की ही आराधना में प्रयुक्त होता है । यह मन्त्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है । गुह्यकाली के अन्य मन्त्र इस प्रकार हैं- क्रीं हूं ह्रीं गुह्य कालिके क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा । इस षोडशाक्षर मन्त्र द्वारा आराधना करने पर साधक को चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है ।