भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 442 में से

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पृष्ठ 437

❧ श्रीकालिका पुराण ❧ ४४१ स्तुति विरंच्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्, समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः । अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥१॥ भावार्थ-हे देवि ! तुम्हारे त्रिगुणात्मक रूप से उत्पन्न ब्रह्मा आदि तीनों देवता तुम्हारी ही आराधना करके प्रधान हुए हैं। तुम्हारा स्वरूप अनादि, सुरादि तथा विश्व का मूलभूत है, उसे देवता भी नहीं जानते हैं ॥१॥ जगन्मोहिनीम् तु वाग्वादिनीम्, सुहृद्पोषिणी शत्रुसंहारणीयम् । वचःस्तम्भनीयम् किमुच्चाटनीयम्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥२॥ भावार्थ-तुम्हारी मूर्ति संसार को मोहित करनेवाली, शत्रुओं का संहार करनेवाली, वचन का स्तम्भन करनेवाली तथा दुष्टों का उच्चाटन करनेवाली है, तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥२॥ इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली, मनोजास्तु कामन्यथार्थ प्रकुर्यात् । तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥३॥ भावार्थ-ये मूर्ति स्वर्ग को देनेवाली, कल्पलता के समान और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करनेवाली है, जिससे वे सदैव कृतार्थ बने रहते हैं। तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥३॥ सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता, लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवस्ते । जपध्यानं पूजासुधाधौतपं‌का, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥४॥