कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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[Main Text] भक्ति से मैं आपसे परम प्रसन्न हूँ। अब तुम वरदान का वरण कर लो जो भी आपका अभीप्सित हो वह मैं स्वयं ही तुझे दे दूंगी। हे प्रजापते ! आपके नियम से, तपों से और आपकी स्तुतियों से मैं बहुत अधिक प्रसन्न हो गयी हूँ। आप वरदान का वरण करो मैं उसी वर को दे दूँगी। दक्ष ने कहा-हे जगन्मयि! हे महामाये! यदि आप मुझे वरदान देने वाली हैं तो आप ही स्वयं मेरी पुत्री होकर भगवान् शंकर की पत्नी बन जाइए। हे देवि! यह वर केवल मेरा ही नहीं है अपितु समस्त जगती का है। हे प्रजेश्र्वरि! यह वर लोकों के ईश ब्रह्माजी का है तथा भगवान् विष्णु का है और भगवान् शिव का भी है। देवी ने कहा-हे प्रजापते! मैं आपकी पुत्री होकर आपकी जाया (पत्नी) में जन्म धारण करने वाली होऊँगी तथा भगवान् शंकर की पत्नी हो जाऊँगी और इसमें विलम्ब नहीं होगा। जिस समय से आप फिर मेरे विषय में मन्द आदर वाले हो जाओगे तब मैं सुखिनी भी अथवा तुरन्त ही अपने देह का त्याग कर दूँगी। हे प्रजापते! यह वर प्रतिसर्ग में आपको दे दिया है कि मैं आपकी सुता होकर भगवान् हर की प्रिया होऊँगा। हे प्रजापते! मैं महादेव को उस प्रकार से सम्मोहित करूँगी कि वे प्रतिसर्ग में निराकुल मोह को समाप्त करेंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से प्रजापति दक्ष से महामाया ने कहा और इसके उपरान्त वह देवी भली-भाँति दक्ष के देखते-देखते ही वहीं पर अन्तर्हित हो गई थीं। उस महामाया के अन्तर्धान हो जाने पर प्रजापति दक्ष की अपने आश्रम को चले गए और उन्होंने परमआनन्द प्राप्त किया था कि महामाया उनकी पुत्री होकर जन्म धारण करेगी। इसके अनन्तर बिना ही स्त्री के संगम के उन्होंने प्रजा का उत्पादन किया था। संकल्प, अविर्भावों के द्वारा तथा मन से और चिन्तन के द्वारा ही प्रजोत्पादन किया था। हे द्विज श्रेष्ठों! वहाँ पर उनके बहुत से पुत्र समुत्पन्न हुए और वे सब देवर्षि नारदजी के उपदेश से इस पृथ्वी पर भ्रमण किया करते हैं। उनके बार-बार जो पुत्र उत्पन्न हुए थे वे सभी अपने भाइयों के ही मार्ग पर नारद जी के वचन से चले