कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकालिका पुराण ४७ प्रमाण करने के योग्य हैं, प्रभा वाली हैं, आप प्रमाण मानमेय नाम वाली और सुख स्वरूपिणी हैं ऐसी आपको मैं करता हूँ। जो पुरुष, देवी आपका चिन्तन करें जो कि आप विद्या-अविद्या के स्वरूप वाली परा हैं उस पुरुष के सुखों का भोग्य और मुक्ति सदा ही करतल में स्थित रहा करती है। जो पुरुष आप देवी की प्रत्यक्ष रूप से परमपावनी का एक बार भी दर्शन प्राप्त कर लेता है उस पुरुष की अवश्य ही मुक्ति हो जाया करती है जो कि विद्या, अविद्या की प्रकाशिका है। हे योगनिद्रे! हे महामाये! हे जगन्मयी! हे विष्णुमाये! जो प्रमाणार्थ सम्पन्न चेतना है वह तेरे ही स्वरूप वाली है। हे जगन्मात! जो पुरुष आपका अम्बिका कहकर स्तवन किया करता है, जो जगन्मयी और मया इन नामों का उच्चारण करके आपकी स्तुति किया करते हैं उनका सभी कुछ अभीष्ट सम्पन्न हो जाया करता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महान् आत्मा वाले दक्ष के द्वारा इस रीति से स्तुति की गयी। जगन्माता उस अवसर पर उसी भाँति दक्ष प्रजापति से बोली जैसे माता सुनती ही नहीं हो। वहाँ पर स्थित सबको सम्मोहित करके जिस तरह से दक्ष वह सुनता है उस प्रकार अन्य माया से नहीं श्रवण करता है उस समय में अम्बिका ने कहा। हे मुनिसत्तम! जिसके लिए पूर्व भी मेरी आराधना की थी वह आपका अभिष्ट कार्य सिद्ध हो गया है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से कहकर उस समय में देवी ने अपनी माया से दक्ष को समझाया था और फिर वह शैशव भाव में समास्थित होकर जननी के समीप रोदन करने लगी थी। इसके अनन्तर वीरणी ने बड़े ही यत्न से यथोचित रूप से सुसंस्कार करके शिशु के पालन की विधि से उनको स्तन दिया था अर्थात् शगुन का दुग्ध पिलाया था। इसके अनन्तर वीरणी के द्वारा पालित की गयी थी तथा महात्मा दक्ष के द्वारा शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा जिस तरह से प्रतिदिन वृद्धि वाला हुआ करता है उसी भाँति वह बड़ी हो गयी थी। हे द्विज श्रेष्ठों! उस देवी में सब सद्गुणों ने प्रवेश कर लिया था जिस तरह से चन्द्रमा में शैशव में भी समस्त मनोहर कलायें प्रवेश किया करती हैं।