कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ ६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ हम विभिन्न स्वरूप वाले होते हैं । हे महेश्वर ! यह सनातन अर्थात् सदा से चला आया तत्व है इसको जान लीजिए । यह माया भी भिन्न रूपों से कमला नाम वाली अर्थात् महालक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री तथा सन्ध्या कार्यों के भेद से ही भिन्न हुई हैं । हे महेश्वर ! अनुराग की प्रवृत्ति का मूल नारी ही है । रामा के परिग्रह से ही पीछे काम, क्रोध आदि का उद्भव (जन्म) होता है । काम क्रोध आदि के कारणस्वरूप अनुराग के होने पर यहाँ पर जन्तुगण विराग के हेतु का यत्नपूर्वक सान्त्वन किया करते हैं । अनुराग के वृक्ष से संग ही सर्वप्रथम महान् फल होता है । उसी संग से काम की समुत्पत्ति हुआ करती है । काम से क्रोध उत्पन्न होता है । स्वाभाविक ज्ञान से ही वैराग्य और निवृत्ति होती है । संसार की विमुखता से सनातन हेतु असंग ही होती है । हे महेश्वर ! यहाँ पर दया नित्य ही हुआ करती हैं अर्थात् जो संसार से विमुख हैं उसमें नित्य ही दया का होना आवश्यक है और दया के साथ-साथ शान्ति भी होती है । अहिंसा और तप, शान्ति ज्ञानमार्ग का अनुसाधन है । आपके तपोनिष्ठ, विसंगी अर्थात् संगरहित तथा दया से संयुत होने पर अहिंसा तथा शान्ति आपको सदा ही होगी । इसके न करने पर जो-जो दोष हैं वे सभी आपको बतला दिए गए हैं । हे जगत्यते ! इस कारण से आप विश्व के और देवों के हित के लिए भार्यार्थ में एक परमशोभना वामा का परिग्रहण करें । जिस प्रकार से लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी है और सावित्री मेरी पत्नी है उसी भाँति शम्भु की जो सहचारिणी होवे उसका ही आप परिग्रहण कीजिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस तरह से हर के आगे ब्रह्माजी के वचन का श्रवण कर मन्द मुस्कराहट के सहित मुख वाले हरि ने उस समय में लोकों के ईश ब्रह्माजी से कहा । ईश्वर ने कहा-जो आपने कहा है वह इसी प्रकार से तथ्य है । ब्रह्माजी ! यह विश्व के ही निमित्त से होना ही चाहिए किन्तु स्वार्थ से भली-भाँति ब्रह्मा के चिन्तन करने से मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है । तो भी वह मैं करूंगा जो जगत् की भलाई