कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ वैतरणी नदी हो गये थे और पूर्व सागर में गमन करने वाले हो गये थे । जलधारा के भेद से और सागर के संसर्ग से कुछ सौम्यता को प्राप्त होकर फिर उन्होंने पृथ्वी का भेदन नहीं किया था । सती के शरीर के खण्ड-खण्ड होकर गिरना इसके अनन्तर शोक से विमूढ़आत्मा वाले शम्भु विलाप करते हुए उस मृत सती के शव ( मृत देह ) को अपने कन्धे पर रखकर प्राच्य देशों को चले गए थे । एक उन्मत्त की भाँति गमन करने वाले इन शंकर के भाव को देवगणों ने देखकर ब्रह्मा आदि देवगण शव के भ्रष्ट होने के कर्म के विषय में चिन्ता करने लगे थे । भगवान् शंकर के शरीर के स्पर्श से यह शव विकीर्णता को प्राप्त नहीं होगा फिर किस रीति से उस वृषभध्वज के कन्धे से इस शव का भ्रंश होगा । यही चिन्तन करते हुए वे ब्रह्मा विष्णु और शनैश्चर योगमाया से अदृश्य होते हुए सती के शव के अन्दर प्रवेश कर रहे थे । देवों ने इसके उपरान्त सती के शव के अन्दर प्रवेश करके उन्होंने उस सती के शव के खण्ड-खण्ड कर दिए थे और विशेष रूप से स्थान-स्थान में उन खण्डों को भूतल में गिरा दिया था । देवीकूट के दोनों चरणों को सबसे प्रथम भूमि में निपातित किया था । उड्डीपान में दोनों उरुओं के युग्म को जगतों के हित के लिए भूमि पर उसको डाला था । कामगिरि कामरूप में योनि मण्डल गिरा था और वहाँ पर ही पर्वत की भूमि में सती के शव का नाभिमण्डल गिरा था । जालन्धर में सुवर्ण के हार से विभूषित स्तनों को जोड़ा गिरा था, पूर्वगिरि में अस और ग्रीवा पतित हुए और फिर कामरूप से शिर पतित हुआ था । भगवान् शंकर जितने भूमि के भाग में सती के शव लेकर गये थे उतना ही प्राच्यों में याज्ञिक देश कीर्तित हुआ था । अन्य जो सती शव के अवयव थे वह छोटे-छोटे टुकड़ों में देवों के द्वारा खण्डित कर दिए गये थे । हे द्विजो! जहाँ-जहाँ पर सभी सती के पाद आदि पर्यन्त शरीर के अवयव गिरे थे वहाँ-वहाँ पर ही महादेव स्वयं लिंग के स्वरूप धारण