कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०८३ श्रीकालिका पुराण ४०८३ ९९ पुरुष मुक्ति को प्राप्त हो गये हैं। वे राग-द्वेष आदि बन्धन के कारणों से छूटे हुए हैं और बुद्ध पुरुष संसार से विमुख होते हैं। हे महेश्वर! विभिन्न वायु, अग्नि और जल के ओघ से रहित, सूर्य और चन्द्रमा से युक्त, इस रीति से दूर में भी स्थित नहीं है अर्थात् सन्निकट में ही वर्तमान हैं। तीन मार्गों के मध्य में संस्थित हैं और अनु प्रकाशक हैं, परमशुद्धमय तत्त्व हैं। जो ज्ञानरूपी जल के द्वारा बर्धित-समीप में ही समुत्पन्न तपरूपी जत्रों से संस्थागित, आठ शास्त्ररूपी तरु का पुष्प है उसका सूक्ष्म उपगमन करने वाला, पीत-पराग सदा ही आपके वश में गमन करने वाला है। समीकरण (वायु) की ध्वनि को नीचे की ओर समाधान करके और रात्रि को ऊपर की ओर निरुद्ध करके हंस के मध्य से हृदय के पद्म के मध्य में रज सुमुखीकृत है परन्तु आपका तेज सर्वदा सर्वत्र है। पूरक अथवा कुम्भक प्राणायामों से रिक्त चित्रों से जो पर नामक प्रेरणा है, वे प्रपञ्च योगियों के द्वारा दृश्य और अदृश्य है। तात्विक रूप से शुद्ध और वृद्ध आपके द्वारा लब्ध हैं। सूक्ष्म जगत् में व्याप्त और गुणों के समूह से पीन मृग्यम्बुधि के साधन-साध्य रूप वाला है। हे महेश! चोर और रक्षकों के द्वारा न तो उज्झित है और न नीत ही है अर्थात् लिया हुआ है ऐसा ही आपका अर्थ से हीन चित्त है। वह चित्त कोप से, शोक से, मान से और दम्भ से भी व्यय नहीं होता है। वह चित्त तो उपयोग करके अन्य प्रकार से ही बढ़ता रहा करता है। आप माया से मोहित हैं इसलिए आप हृदय में स्थित को ही आपने विस्मृत कर दिया है। माया को भिन्न समझकर अपनी आत्मा के द्वारा ही आत्मस्वरूप को धारण करो। हे महेश्वर! जगत् के हित के सम्पादन करने के लिए हमने पूर्व में ही माया का स्तवन किया था उसके द्वारा ध्यान में संलग्न चित्त बहुत से प्रयत्नों के द्वारा प्रसाधित है। शोक, क्रोध, लोभ, काम, मोह, परात्मता, ईर्ष्या, मान, संशय, कृपा, असूया, जुगुप्सिता ये बारह, मन में मल होते हैं जो बुद्धि के नाश करने के हेतु हैं। आप जैसे महापुरुषों द्वारा इन बारह मानस मलों का सेवन नहीं किया जाया करता है। हे