भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

द्वितीयांश— सप्तम अध्याय ततो विष्णु : सर्वजिष्णु कल्कि कल्कविनाशनः । कालयामास ता सेना करिणीमिव केसरी ।१। सेनागना ता रतिसगरक्षती रक्ताक्तवस्त्रा विवृतोरुमध्‍याम् । पलायती चारुविकीर्णकेशा विकूजती प्राह स कल्किनायकः ॥२॥ रे बौद्धा ! मा पलायध्व निवर्त्तध्व रणाङ्कणे । युध्यध्व पौरुष साधु दर्शयध्व पुनर्मम ॥३॥ जिनो हीनबल कोपात्कल्केराकर्ण्य तद्वचः । प्रतियोद्धु वृषारूढः खड्गचर्मधरो ययौ ।४। नाना प्रहरणोपेतो नानायुधविशारद कल्किना युयुधे धीरो देवाना विस्मयावहः ॥५॥ सूतजी बोले—जैसे सिंह हथियो पर आक्रमण करता है, वैसे ही पाप का नाश करने वाले तथा सब विजेता कल्किजी ने उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया ।१। युद्ध रुधिर रूपी वस्त्रो का धारण करने वाली विवृत ऊरु सम्पन्ना, विकीर्ण केशा प्रलाप करती हुई अर्थात हाहाकार करती हुई, रति युद्ध में आहत नारी के समान भागने वाली उस सेना से कल्किजी ने कहा ।२। अरे बौद्धो ! तुम इस युद्ध स्थल से मत भागो । आओ, लौट आओ और अपना पौरुष दिखाने मे पीछे न हटो ।३। कल्कि की बात सुन कर बल से हीन हुआ जिन क्रोध पूर्वक चर्म की तलवार लेकर युद्ध करने के लिए उनके समक्ष आया ।४। विविध प्रकार के युद्धो मे विशारद जिन कल्किजी से युद्ध करने लगा । उसका रणचातुर्य देख कर देवता भी आश्चर्य करने लगे ।५। ३५४