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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं मंगलाचरण

<u>कल्कि पुराण के बारे में ध्यान देने योग्य बातें</u> ये भूतकाल वाचक वाक्य में लिखा गया है (Past Sentence) जैसे हम कहेंगे :- “भगवान कलिक का अवतार सम्बल ग्राम में होगा “ परन्तु कलिक पुराण में लिखा गया है:- “भगवान कलिक का अवतार सम्बल ग्राम में हुआ“

श्रीकल्कि-पुराण

(१) कलिकाल की भीषणता २५७, (२) कल्किका जन्म २६५ (३) कल्कि को शिवजी का शस्त्र-प्रदान २७२, (४) कल्कि का उपदेश २८१ (५) पद्मा की कथा २८८ (६) शुक और पद्मा की वार्ता २६४, (७) विष्णु पूजन विधि ३०१ । ॥ २ ॥ (१) कल्कि का सिंहल गमन ३०८, (२) कल्कि-पद्मा मिलन, ३१६ (३) कल्कि पद्मा विवाह (४) अनन्त मुनि का उपाख्यान ३२६ (५) अनन्त का माया वर्णन ३३६, (३) सभल नारी का दिव्य रूप ३४७, (७) बौद्धो से सग्राम ३५४ । ॥ ३ ॥ (१) स्त्रियो का युद्धार्थ आगमन, ३६३, (२) कुथोदरी का हनन ३७०, (३) मरु और देवापि का आगमन ३७६, (४) चन्द्र वश कथन ३६४, (५) सत्युग का आगमन ४०१, (६) धर्म से कल्कि का सवाद ४०५, (७) कोक-विकोक से युद्ध ४१३, (८) भल्लाट नगर पर आक्र- मण ४२०, शशिध्वज-कल्कि सग्राम ४२८, (१०) शशिध्वज की पुत्री से विवाह (११) शशिध्वज को पूर्व जन्म कथा ४३६, (१२) भक्ति-तत्व वर्णन ४४८, (१३) मणि चोरी की कथा ४५४, (१४) शशिध्वज का वन गमन ४६१, (१५) माया स्तव ४६८ (१३) कल्कि का यज्ञानुष्ठान ४७२, (१७) देवयानी शर्मिष्ठा की कथा ४८१, (१८) कल्कि का वन विहार ४८६, (१६) कल्कि का वैकुण्ठ गमन ४६४, (२०) गगाजी की स्तुति ५०६, (२१) कल्कि पुराण का उपमहार ५०१,

कल्किपुराण प्रथम अंश प्रथम-अध्याय सेन्द्रा देवगणा मुनीश्वरजना लोकाः सपांलाः सदा । स्व स्व कर्म सुसिद्धये प्रतिदिन भक्त्या भजन्त्युत्तमाः । तं विघ्नेशमनन्तमच्युतमजं सर्वज्ञसर्वाश्रयं । वन्दे वैदिकतान्त्रिकादिविविधैः शास्त्रैः पुरोध्वन्दितम्॥१॥ नारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ २ ॥ यद्दोर्दण्डकरालसर्पकवलज्वालाज्वलद्विग्रहाः नेतुः सत्करवालदण्डदलिता भूपाःक्षितिक्षोभकाः । शश्वत् सैन्धववाहनो द्विजजनिः कल्किः परात्मा हरिः पायात्सत्ययुगादिकृत्स भगवान्धर्मप्रवृत्तिप्रियः ॥ ३ ॥ इति सूतवचः श्रुत्वा नैमिषारण्यवासिनः । शौनकाद्या महाभागाः पप्रच्छुस्तं कथामिमाम् ॥ ४ ॥ हे सूत! सर्वधर्मज्ञ ! लोमहर्षणपुत्रक ! । त्रिकालज्ञ ! पुराणज्ञ ! वद भागवतीं कथास् ॥ ५ ॥ क कलिः ? कुत्र वा जातो जगतामीश्वरं प्रभुः । कथ वा नित्य धर्म्मस्य विनाश कलिना कृतः ? ॥ ६ ॥ इति तेषा वचः श्रुत्वा सूतो ध्यात्वा हरिं प्रभुम् । सहर्षपुलकोद्भिन्न सर्वाङ्गः प्राह तान्मुनीन् ॥ ७ ॥

( २५८ ) प्राचीन काल मे वैदिक तान्त्रिक आदि विविध शास्त्रो के द्वारा आराधित इन्द्र सहित देवता, मुनीश्वर और लोकपालो द्वारा स्वकार्य- सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक सतत उपासित, विघ्नेश, अनन्य, अच्युत, अजन्मा, सर्वज्ञ एव सर्वाश्रय स्वरूप भगवान् विष्णु का वन्दन करता हूँ ॥१॥ नर, नारायण कहे जाने वाले नरोत्तम को एव भगवती सरस्वती को नमस्कार करके उनकी जय बोलता हूँ ॥२॥ जिनके भयकर भुज भुजग के विष ज्वाल मे पडकर अपने घोर अत्याचारो से भूमडल की शान्ति भग करने वाले राजागण भस्म हो जायगे और जिनके भयकर खड्ग की तीक्ष्ण धार से राजाओ के देह मर्दित होगे, वे ब्राह्मण वश मे उत्पन्न होकर, युग-युग मे अवतार धारण करने वाले भगवान् श्री हरि कल्क रूप मे रक्षा करे ॥३॥ सूतजी के यह वचन सुन कर नैमिषारण्य निवासी शौनकादि महा- भागो मे उनसे पूछा ॥४॥ हे सूतजी ! हे सर्व धर्मो के ज्ञाता, हे लोम- हर्षरण-पुत्र ? हे त्रिकालज्ञ ? हे पुराणो के भली प्रकार जानने वाले ? अब आप भगवान् की कथा को विस्तृत रूप से कहिये ॥५॥ कलि कौन है ? वह कहाँ उत्पन्न हुआ ? वह किस प्रकार पृथिवी का अधीश्वर बन गया ? तथा उसने नित्यधर्म को किस प्रकार विनष्ट कर दिया ? यह सब हमारे प्रति कहिये ॥६॥ महर्षियो के यह वचन सुनकर सूतजी ने भगवान् श्री हरि का ध्यान किया और फिर पुलकित अग होकर कहने लगे ॥७॥ शृणुध्वमिदमाख्यानं भविष्य परमाद्भुतम् । कथि ब्रह्मणा पूर्वं नारदाय विपृच्छते ॥ ८ ॥ नारद प्राह मुनये व्यासायामिततेजसे । सव्यासो निजपुत्राय ब्रह्मराताय धीमते ॥ ६ ॥ स चाभिमन्युपुत्राय विष्णुराताय ससदि ।

( २३६ ) प्राह भागवतान्धर्मानष्टादशसहस्रकान् ॥ १० ॥ तदा नृपे लय प्राप्ते सप्ताहे प्रश्नशेषितम् । मार्कण्डेयादिभिः पृष्टः प्राह पुण्याश्रमे शुकः ॥ ११ ॥ तत्राह तदनुज्ञातः श्रुतवानस्मि या कथा । भविष्या कथयामीह पुण्या भागवती शुभा ॥ १२ ॥ सूतजी बोले--हे मुनीश्वरो ! प्राचीन समय की बात है—इस परम अद्भुत उपाख्यान कोपूछने पर ब्रह्माजी ने नारदजी से जो कहा था, वही मे आपके प्रति कहता हूँ ॥८॥ फिर नारद जी ने इसका वर्णन व्यासजी से किया, जिसे व्यासजी ने अपने मेधावी पुत्र ब्रह्मरात को सुनाया ॥६॥ ब्रह्मरात ने उसे अभिमन्यु-पुत्र विष्णुरात के प्रति अठारह सहस्र श्लोको मे सभा मडप के मध्य मे सुनाया ॥१०॥ उस समय प्रश्न होते-होते राजा विष्णुरात ने एक सप्ताह मे शेष प्रश्नो को पूर्ण कर लिया और लय को प्राप्त हो गये । उसी कथा के शेष अंश अर्थात् संक्षिप्त रूप को शुकदेवजी ने मार्कण्डेय प्रभृति मुनियो के प्रश्न करने पर कहा ॥११॥ भगवान् श्री शुकदेवजी द्वारा वर्णित उसी सक्षिप्त पुण्यमय, भागवत उपाख्यान को, जो भविष्य मे घटित होने वाला है, आपसे कहता हूँ ॥१२॥ ताः शृणुध्वम्महाभागा समाहित धियोऽनिशम् । गते कृष्णे स्वनिलय प्रादुर्भूतो यथा कलिः ॥ १३ ॥ प्रलयान्ते जगत्स्रष्टा ब्रह्मा लोकपितामह । ससर्ज घोर मलिन पृष्ठदेशात स्वपातकम् ॥१४॥ स चाधर्म इति ख्यातस्तस्य वंशानुकीर्त्तनात । श्रवणात्स्मरणाल्लोक सर्वपापै प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ अधर्मस्य प्रियारम्या मिथ्या मार्जारलोचना । तस्य पुत्रोऽसितेजस्वी दम्भः परमकोपनः ॥ १६ ॥

( २६० ) स मायाया भगिन्यान्तु लोभः पुत्रञ्च कन्यकाम् । निकृति जनयामास तयो क्रोध सुतोऽभवत् ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण के अपने लोक को पधारने के पश्चात् जिस प्रकार कलि की उत्पत्ति हुई, उस सब को कहता हूँ, आप लोग समाहित चित्त सुने ॥१३॥ जब प्रलयकाल व्यतीत हो गया तब ससार-स्रष्टा, लोक- पितामह ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया ॥१४॥ उसी पातक का नाम अधर्म हुआ, उस अधर्म के वंश का श्रवण, स्मरण एव रहस्य जानने से प्राणीमात्र सब पापो से मुक्त हो सकते है ॥१५॥ उस अधर्म की पत्नी बिल्ली जैसे नेत्र वाली, अत्यन्त रम्या हुई, जिसका नाम मिथ्या हुआ । फिर अधर्म के सयोग से अति तेजस्वी, महाक्रोधी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दभ था ॥१६॥ अधर्म और मिथ्या ने माया नाम की एक कन्या भी उत्पन्न की । दंभ और माया के सयोग से लोभ नामक पुत्र और निकृति नाम की कन्या हुई । लोभ और निकृति के सयोग से क्रोध नामक पुत्र हुआ ॥१७॥ सहिंसाया भगिन्यान्तु जनयामास त कलिम् । वामहस्त धृतोपस्थ तैलाभ्यक्ताञ्जनप्रभम् ॥ १८ ॥ काकोदर करालास्यं लोलजिह्वं भयानकम् । पूतिगन्ध द्यूतमद्यस्त्री सुवर्णकृताश्रयम् ॥ १६ ॥ भगिन्यान्तु दुरुक्त्या स भय पुत्रञ्च कन्यकाम् । मृत्यु स जनयामास तयोश्च निरयोऽभवत् ॥ २० ॥ यातनाया भगिन्यान्तु लेभे पुत्रायुतायुतम् । इत्थ कलिकुले जाता बहवो धर्मनिन्दका ॥ २१ ॥ यज्ञाध्ययनदानादिवेदतन्त्रविनाशका । आधिव्याधिजराग्नानिदुःखशोकभयाश्रया. ॥ २२ ॥ क्रोध की सयोनि हिंसा हुई । उन दोनो के सयोग से ससार को नष्ट वाले कलि की उत्पत्ति हुई । इस वाम कर मे उपस्थ धारण करने वाले कलि की देह कान्ति काजल के समान काली हुई ॥१८॥ काकोदर, कराल, चंचल जिह्वा वाले, भयानक दुर्गन्ध युक्त शरीरधारी इस कलि

( २६१ ) ने द्यूत, मद्य, स्त्री और स्वर्ण मे निवास किया ॥१९॥ कलि की सगर्भा दुरुक्ति हुई । उन दोनो ने भयानक नामक पुत्र और मृत्यु नाम की कन्या उत्पन्न की । मृत्यु ने उसके द्वारा निरय नामक पुत्र को उत्पन्न किया ॥२०॥ निरय की सगर्भा यातना हुई । इन दोनो के सयोग से हजारो पुत्र उत्पन्न हुए । इस प्रकार कलि के कुल मे बहुतेरे धर्म-निन्दको की प्रतारणा हुई ॥२१॥ यह सभी आधि व्याधि बुढापा, ग्लानि दुख शोक और भय के आश्रय को प्राप्त होकर यज्ञ, अध्ययन, दानादि एव वैदिक तथा तांत्रिक कर्मों का नाश करने वाले हुए ॥२२॥ कलिराजानुगाश्चेरूर्यूथशो लोकनाशकाः । बभूवुः कालविभ्रष्टाः क्षणिकाः कामुका नराः ॥ २३ ॥ दम्भाचारदुराचारास्तातमातृविहिंसकाः । वेदहीना द्विजा दीनाः शूद्रसेवापराः सदा ॥ २४ ॥ कुतर्कवादबहुला धर्मविक्रयिणोऽधमाः । वेदविक्रयिणो व्रात्या रसविक्रयिणस्तथा ॥ २५ ॥ मांसविक्रयिणः क्रूराः शिश्नोदरपरायणाः । परदाररता मत्ता वर्णसङ्करकारकाः ॥ २६ ॥ ह्रस्वाकाराः पापसाराः शठा मठनिवासिनः । षोडशाब्दायुषः श्यालबान्धवा नीचसङ्गमा ॥ २७ ॥ लोकचरण का नाश करने वाले, कलिराज के अनुचर यूथों ने चंचल, क्षण-भंगुर और कामुक मनुष्य-देह धारण किये ॥२३॥ यह घोर दम्भी, दुराचारी, मातृ-पितृ-हिंसक अनुचरगण ब्राह्मण कुल मे जन्म लेकर भी वेद-विहीन, दरिद्री और शूद्रो के सेवा-परायण हुए ॥२४॥ कुतर्कवाद की बहुलता से युक्त, धर्म, वेद, रस, मांस आदि के विक्रय मे तत्पर, सस्कार-विहीन, शिश्नोदर-परायण, परदार-परायण, उन्मत्त एव वर्णशङ्कर सन्तानो के उत्पन्न करनेवाले हुए ॥२५-२६॥ यह नाटे आकार के, पापी, शठ, मठो मे निवास करने वाले, सोलह वर्ष की परम आयु वाले, यह कलि के सेवकगण साले को भाई के समान

( २६० ) मानने वाले और नीचो की संगति करने वाले हुए ॥२७॥ विवादकलहक्षुब्धाः केशवेशविभूषणाः । कलौ कुलीना धनिनः पूज्या वार्द्धुषिका द्विजाः ॥ २८ ॥ सन्यासिनो गृहासक्ता गृहस्थास्त्वविवेकिनः । गुरुनिन्दापरा धर्मध्वजिनः साधुवञ्चकाः ॥ २६ ॥ प्रतिग्रहरता शूद्राः परस्वहरणादरः । द्वयो स्वीकारमुद्वाहः शठे मैत्री वदान्यता ॥ ३० ॥ प्रतिदाने क्षमाशक्तौ विरक्तिकरणक्षमे । वाचालत्वञ्च पाण्डित्ये यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ॥ ३१ ॥ धनाढ्यत्वञ्च साधुत्वे दूरे नीरे च तीर्थता । सूत्रमात्रेण विप्रत्व दण्डमात्रेण मस्करी ॥ ३२ ॥ विवाद-कलह से क्षुब्ध रहने वाले, केश विन्यास में आसक्त, धन- वान, ब्याज से जीविका चलाने वाले एवं कुलीन कहलाने वाले यह ब्राह्मण ही कलिकाल मे पूजनीय हुए ॥२८॥ सन्यासी गृहस्थ-धर्म परायण हो गए, गृहस्थो मे विवेचन शक्ति का अभाव होगया, शिष्य गुरु निन्दक और धर्मध्वजी साधु वंचक होंगए ॥२६॥ शूद्र दान लेने और पर-सम्पत्ति के हरण करने वाले हुए, स्त्री-पुरुष की सहमति ही विवाह हुआ, मित्र शठ हुए, प्रतिदान ही दानशीलता होगया, न्यायाधीश दण्ड देने मे असमर्थ होकर क्षमाशील होगए, दुर्बल के प्रति उदासीनता होने लगी, अधिक बोलने वाले ही पडित कहे जाने लगे तथा यश की कामना से ही लोग धर्म का सेवन करने लगे ॥३०-३१॥ धनवान ही साधु पुरुष माने जाने लगे, दूर का लाया हुआ जल ही तीर्थ का जल होगया, यज्ञो- पवीत मे ही ब्राह्मणत्व निहित होगया और दण्ड धारण सन्यासी का लक्षण रह गया ॥३२॥ अल्पशस्या वसुमती नदीतीरेऽवरोपिता । स्त्रियो वेश्यालापसुखाः स्वपुंसा व्यक्तमानसाः ॥ ३३ ॥ परान्नलोलुपा विप्राश्चण्डालगृहयाजकाः ।

( २६३ ) स्त्रियो वैधव्यहीनाश्च स्वच्छन्दाचरणप्रिया. ॥ ३४॥ चित्रवृष्टिकरा मेघा मन्दशस्या च मेदिनी । प्रजाभक्षा नृपा लोका. करपीडाप्रपीडिताः ॥ ३५ ॥ स्कन्धे भार करे पुत्रं कृत्वा क्षुब्धाः प्रजाजन. । गिरिदुर्गं वन घोरमाश्रयिष्यन्ति दुर्भगा. ॥ ३६ ॥ मधुमासैर्मूलफलैराहारै प्राण धारिण । एव तु प्रथमे पादे कले कृष्णविनिन्दका. ॥ ३७ ॥ पृथिवी अल्पशस्या होगयी, नदियाँ अन्यान्य स्थानो मे बहने वाली हुई, नारियाँ वेश्यालय मे सुख मानने लगीं और भार्याओं का पति मे अनुराग नही रहा ॥३३॥ पराये अन्न की कामना वाले ब्राह्मण शूद्रो के यहाँ यजन करने लगे, विधवाओ ने वैधव्य का आचरण त्याग दिया और स्वच्छन्द आचरणवाली होगई ॥३४॥ मेघ,खण्ड-वृष्टि वाले हुए, पृथिवी मन्दशस्या हुई, राजागण प्रजा-भक्षक होगये, जिससे प्रजा करों के भार से उत्पीडित हो उठी ॥ ३५ ॥ अत्यन्त क्षुब्ध हुए प्रजाजन कन्धे पर बोझओर हाथ में पुत्र लेकर दुर्गम पर्वत और घोर वनो में जाकर आश्रय खोजने लगे ॥ ३६ ॥ मधु,मास मूल और फल का भोजन ही प्राण धारणा का सहारा बन गया । कलि के प्रथम पाद मे ही मनुष्यगण श्री कृष्ण-निन्दक हो गये ॥ ३७ ॥ द्वितीये तन्नामहीनास्तृतीये वर्णसङ्कर. । एकवर्णाश्चतुर्थे च विस्मृत,च्युतसत्क्रियाः ॥ ३८ ॥ निःस्वाध्या-स्वधा-स्वाहा-वौषडोंकार-वर्जिता. । देवा सर्वे निराहारा. ब्रह्माण शरण ययु ॥ ३६ ॥ धरित्रीमग्रत कृत्वा क्षीणां दीनां मनस्विनीम् । ददृशुर्ब्रह्मणौ लोक वेदध्वनिनादितम् ॥ ४० ॥ यज्ञधूमै समाकीर्णं मुनिवर्यै निषेवितम् । सुवर्ण वेदिकामध्ये दक्षिणावर्त्त मुज्ज्वलम् ॥ ४१ ॥ र्वृत्ति यूपाइङ्कितोद्यान-वन-पुष्प-फलान्वितम् ।

( २६४ ) सरोभिः सारसैर्हंसैराहूयन्त मिवातिथिम् ॥ ४२ कलि के द्वितीय पाद में लोग श्रीकृष्ण नाम को भी भूल गए, तीसरे पाद में वर्ण संकर उत्पन्न हुए और चौथे पाद में तो जाति-पाँति ही कुछ न रही, लोग सत्कर्म और ईश्वर को भी भूल गये ॥ ३८ ॥ स्वाध्याय, स्वधा, स्वाहा, वषट्कार और ओंकारादि का लोप हो गया जिससे सभी देवता आहार न मिलने के कारण पीड़ित होकर ब्रह्माजी की शरण में गये ॥ ३६ ॥ सभी क्षीणता को प्राप्त हुए दीन देवगण चिन्तित पृथ्वी को आगे करके ब्रह्म-लोक को गये । वह लोक उन्हें वेद-ध्वनि से गूँजता हुआ दिखाई दिया ॥ ४० ॥ वहाँ यज्ञ का धुआ फैल रहा था, मुनिगण उपासना एव यज्ञ कर रहे थे, स्वर्ण-वेदी के मध्य दक्षिणाग्नि प्रज्वलित थी, उद्यान वन-पुष्पों और फलो से परिपूर्ण थे, सरोवर में सारस और हंसों के मधुर स्वर ऐसे लग रहे थे, मानों अतिथियों का स्वागत कर रहे हों ॥ ४१-४२ ॥ वायु लोललताजालकुसुमालिकुलाकुलैः । प्रणताह्वान-सत्कार-मधुरालापवीक्षणै ॥ ४३ ॥ तद्ब्रह्मसदनं देवाः सेश्वराः क्लिन्नमानसाः । विविशुस्तदनुज्ञाता निजकार्य निवेदितुम् ॥ ४४ ॥ त्रिभुवनजक सदासनस्थ सनक-सनन्दन-सनातनेडवसिद्धैः परिसेवित पादकमल ब्रह्माण देवता नेमुः ॥ ४५ ॥ चंचल पवन लता-जालो को झकोर रहा था, अलि अवलि कलियों का रस-पान करते गूँज रहे थे, मानों यह सभी प्रणाम, आह्वान, सत्कार आदि के लिए मधुर वाणी का प्रयोग कर रहे हों ॥ ४३ ॥ अपने स्वामी इन्द्र के सहित खेद युक्त मन वाले सब देवता ब्रह्माजी की आज्ञा प्राप्त करके अपना दुःख निवेदन करने के लिए ब्रह्म-सदन में प्रविष्ट हुए ॥ ४४ ॥ वहाँ जाकर सनक, सनन्दन और सनातन से अपने चरण-कमलों की सेवा कराते हुए एवं श्रेष्ठ आसन पर आसीन ब्रह्मा- जी को उन देवताओं ने नमस्कार किया ॥ ४५ ॥

द्वितीय अध्याय उपविष्टास्ततो देवा ब्रह्मणो वचनात्पुरः । कलेर्दोषाद्धर्महानि कथयामासुरादरात् ॥ १ ॥ देवाना तद्वच श्रुत्वा ब्रह्मा तानाह दुःखितान् । प्रसादयित्वा तं विष्णु साधयिष्याम्यभीप्सितम् ॥ २ ॥ इति देवै परिवृत। गत्वा गोलोकवासिनम् । स्तुत्वा प्राह पुरो ब्रह्मा देवाना हृदयेप्सितम् ॥ ३ ॥ सूतजी बोले—हे मुनीश्वरो ! वहाँ जाकर वे सभी देवता ब्रह्माजी की आज्ञा से उनके समक्ष बैठ गये । फिर उन्होने कलि के दोषो से जो धर्म की हानि हुई थी, उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदन किया ।। १ ।। दुःखित हृदय वाले देवताओ के वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले—मै भगवान् विष्णु की आराधना करके तुम्हारा सब मनोरथ सिद्ध करता हूँ ॥२॥ यह कर ब्रह्माजी ने देवताओ को साथ लिया और गोलोक निवासी भगवान् श्री हरि की सेवा मे जा पहुँचे । वहाँ उन्होने स्तुति की और फिर देवताओ की कामना निवेदन की ॥३॥ तच्छ्रुत्वा पुण्डरीकाक्षो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ शम्भले विष्णुयशसो गृहे प्रादुर्भावाम्यहम् । सुमत्योमातरि विभो ! पत्न्यां त्वन्निदेशतः ॥ ४ ॥ चतुर्भिर्भ्रातृभिर्देव ! करिष्यामि कलिकक्षयम् । भवन्तो बान्धवा देवाः स्वांशेनावतरिष्यथ ॥ ५ ॥ इय मम प्रिया लक्ष्मी सिंहले संभविष्यति । बृहद्रथस्य भूपस्य कौमुद्या कमलेक्षणा । भार्यया मम भार्ये० ज्ञानाम्नी जनिष्यति ॥ ६ ॥

प्रथम अंश: अध्याय १-३ (कलियुग प्रभाव व कल्कि अवतार)

( २६६ ) यात यूय भुव देवा स्वाशावतरणैरता । राजानौ मरुदेवापी स्थापयिष्याम्यह भुवि ॥ ७ ॥ पुण्डरीकाक्ष भगवान् ने देवताओ की दुःख-गाथा सुनकर ब्रह्माजी से कहा- हे विभो ! मै शम्भल ग्राम मे विष्णुयश के यहाँ, उनकी पत्नी सुमति के गर्भ से उत्पन्न हूँगा ॥४॥ हे ब्रह्मन् ! हम चारो भाई मिलकर उस कलि को नष्ट कर डालेगे । अब सभी देवताओ को भी अपने-अपने बाँधवो सहित पृथिवी पर अवतार लेना है ॥५॥ मेरी प्रिया लक्ष्मी सिंहल द्वीप मे महाराज बृहद्रथ की रानी कौमुदी के गर्भ से उत्पन्न होगी, इसका नाम पद्मा होगा ॥६॥ मरु और देवापि नामक दो राजाओ को भी पृथिवी पर उत्पन्न करुँगा । हे देवगण ! अब तुम भी शीघ्रही अपने-अपने अंश के सहित भूमण्डल पर अवतार धारण करो ॥७॥ पुन कृतयुग कृत्वा धर्मान्संस्थाप्य पूर्ववत् । कलिक्याल सनिरस्य प्रयास्ये स्वालय विभौ ॥ ८ ॥ इत्युदीरितमाकर्ण्य ब्रह्मा देवगणैर्वृत । जगाम ब्रह्मसदन देवाश्च त्रिदिव ययु ॥ ६ ॥ महिमा स्वस्य भगवान्निजजन्मकृतोद्यमः । विप्रर्षे ! शम्भलग्राममाविवेश परात्मकः ॥ १० ॥ हे विभो ! जब पृथिवी पर सत्ययुग का पुन आविर्भाव कर दूँगा और धर्म का पूर्ववत् स्थापन तथा कलिकाल रूपी नाग को नष्ट कर डालूँगा, तब पुन अपने इस लोक मे आ जाऊँगा ॥८॥ देवताओ से घिरे हुए ब्रह्माजी ने भगवान् की यह आज्ञा सुनकर ब्रह्मलोक को प्रस्थान किया और सब देवता अपने स्वर्ग लोक को चले गये ॥६॥ हे ऋषियो ! अपनी महिमा से महिमान्वित भगवान् विष्णु इस प्रकार शम्बल ग्राम मे स्वय अवतार धारण करने के लिए प्रविष्ट हुए ॥१०॥ सुमतयां विष्णु यशसा गर्भमाधत्त वैष्णवम् । ग्रह-नक्षत्र-राश्यादि-सेवित-श्रीपदाम्बुजम् ॥ ११ ॥

( २६७ ) सरित्समुद्रा गिरयो लोका सस्थाणुजङ्गमा । सहर्षा ऋषयो देवा जाते विष्णौ जगत्पतौ ॥ १२ ॥ बभूवु सर्वसत्वानामानन्दा विविधाश्रया । नृत्यन्ति पितरो हृष्टास्तुष्टा देवा जगुर्यश ॥ १३ ॥ चक्रुर्वाद्यानि गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणा ॥ १४ ॥ द्वादश्या शुक्लपक्षस्य माधवे मासि माधव । जात ददृशतु पुत्र पितरौ हृष्टमानसौ ॥ १५ ॥ भगवान् श्रीहरि विष्णुयश के द्वारा उनकी पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर भ्रूण रूप हुए ।।११।। यह जानकर कि विष्णु पृथिवी पर आ गये है, सभी सरिता, समुद्र, पर्वत, स्थावर जगम प्राणी, ऋषि- गण और देवगण आदि सभी प्रसन्न हो उठे ।।१२। तथा सभी जीव विभिन्न प्रकार से हर्ष प्रकट करने लगे, पितर नाचने लगे और देवता प्रभु के गुणगान मे तत्पर हुए ।।१३।। गधर्व बाजे बजाने और अप्सराये नृत्य करने लगी ।।१४।। वैशाख शुक्ला द्वादशी के दिन भगवान् ने अवतार लिया । उनको प्रकट होते हुए देखकर माता-पिता पुलकित हो उठे ।।१५।। धातुमाता महाषष्ठी नाभिच्छेत्री तदम्बिका । गङ्गोदकक्लेदमोक्षा सावित्री मार्जनोद्यता ॥ १६ ॥ तस्य विष्णोरनन्तस्य वसुधाऽधात्पय सुधाम् । मातृका माङ्गल्यवच कृष्णजन्मदिने तथा ॥ १७ ॥ ब्रह्मा तदुपधार्याशि स्वाशग् प्राह सेवकम् । याही त मृतिकागार गत्वा विष्णु प्रबोधय ॥ १८ ॥ चतुर्भुजमिद रूपं देवानापि दुर्लभम् । त्यक्त्वा मानुषवद्रूप कुरुनाथ ! विचारितम् ॥ १६ ॥ इति ब्रह्मवचा श्रुत्वा पवन सुरभि सुखम् । सशीत प्राह तरमा ब्रह्मणो वचनाहत ॥ २० ॥

( २६८ ) भगवान् के प्रकट होने पर महाषष्टी धात्री हुई, अम्बिका ने नाल छेदन किया, गङ्गाजी ने अपने जल से गर्भक्लेद को हटाया और सावित्री ने भगवान् के शरीर का मार्जन किया ॥१६॥ कृष्ण-जन्म के समान ही अनन्त भगवान् के अवतार लेने पर वसुन्धरा ने दुग्धसुधा की धारा प्रवाहित कर दी, मातृकाओ ने मगला- चार किया ॥१७॥ शम्बल ग्राम मे भगवान् के अवतरित होने का समाचार जानकर ब्रह्माजी ने वायु को आज्ञा दी कि तुम सूतिकागार मे जाकर भगवान् से इस प्रकार कहो ॥१८॥ कि आपके चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन तो देवताओ के लिए भी दुर्लभ है, अतः हे नाथ ! इस चतुर्भुज रूप को छोडकर मनुष्य रूप बनाइये ॥१९॥ सुशीतल, सुखद, सुगन्धित वायु ने यह वचन सुनकर द्रुतगति से सूतिकागार मे जाकर भगवान् से निवेदन किया ॥२०॥ तच्छ्रुत्वा पुण्डरीकाक्षस्तत्क्षणाद्द्विभुजोऽभवत् । तदा तत्पितरौ दृष्ट्वा विस्मयापन्नमानसौ ॥ २१ ॥ भ्रमसस्कारवत्तत्र मेनाते तस्य मायया । ततस्तु शम्बलग्रामे सोत्सवा जीवाजातय । मङ्गलाचारबहुला पापतापविवर्ज्जिता. ॥ २२ ॥ सुमतिस्त सुतलब्ध्वा विष्णु जिष्णु जगत्पतिम् । पूर्णकामा विप्रमुख्यानाहूयाद्गवा शतम् ॥ २३ ॥ हरे कल्याणकृद्विष्णुयशा शुद्धेन चेतसा । सामर्ग्यजुर्विद्भिर्ऋग्भैश्चस्तन्नामकरणे रत ॥ २४ ॥ तद राम कृपो व्यासो द्रौणिभिक्षुशरीरिण । समायाता हरि द्रष्टु बालकत्वमुपागतम् ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी का संदेश प्राप्त होने पर भगवान् ने अपना स्वरूप दो भुजाओ से युक्त बना लिया। यह लीला देखकर माता-पिता विस्मित रह गये ॥२१॥ प्रभु की माया मे मोहित हुए माता-पिता ने समझा कि

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भ्रम से ही हमने अपने पुत्र को चार भुजा देखा था । फिर उस शम्भल ग्राम मे सभी पाप-ताप नष्ट होकर नित्य नवीन मगलाचार होने लगे ॥२२॥ भगवान् को पुत्र रूप मे प्राप्त करके पूर्णकामा सुमति ने ब्राह्मणो को एक सौ गौय दान की ॥२३। पवित्र हृदय वाले विष्णु- यशजी ने अपने पुत्र के मगल की कामना से ऋक्, यजु और सामवेदी ब्राह्मणो को नामकरण के लिए नियुक्त किया ॥२४॥ भगवान् के शिशु- रूप का दर्शन करने के लिए परशुराम, कृपाचार्य, वेदव्यास और द्रोणा- चार्यजी के पुत्र अश्वत्थामा भिक्षुक वेश मे वहाँ आये ॥२५॥ तानागतान्समालोक्य चतुरः सूर्यसन्निभान् । हृष्टरोमा द्विजवर पूजयाञ्चक्र ईश्वरान् ॥ २६ ॥ पूजितास्ते स्वासनेषु सविष्टा स्वसुखाश्रया । हरि क्रोडगत तस्य ददृशु सर्वमूर्त्तयः ॥ २७ ॥ तबालक नराकार विष्णु नत्वा मुनीश्वरा । कल्कि कल्कविनाशार्थमाविर्भूतं विदुर्बुधाः ॥ २८ ॥ नामाकुर्वस्ततस्तस्य कल्किरित्यभिविश्रुतम् । कृत्वा सस्कारकर्माणि ययुस्ते हृष्टमानसाः ॥ २६ ॥ तत स ववृधे तत्र सुमत्या परिपालित । कालेनाल्पेन कसारि शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ ३० ॥ सूर्य के समान तेजस्वी उन ईश्वर स्वरूप आगन्तुको को देखकर द्विजवर विष्णुयश ने उनका पूजन किया ॥२६॥ भले प्रकार सुपूजित हुए वे मुनिगण श्रेष्ठ आसनो पर सुखपूर्वक विराजे, तब उन्होने अपने पिता की गोद मे बैठे हुए भगवान के दर्शन किए ॥२७॥ उन ज्ञानी मुनीश्वरो ने मनुष्य रूप मे शिशु स्वरूप भगवान् को नमस्कार किया और तब उन्होने जान लिया कि कलिकाल के विनाशार्थ भगवान् श्री कल्कि का अवतार हुआ है ॥२८॥ फिर उनका सस्कार करते हुए उनका कल्कि नाम रखकर प्रसन्न मन से वे मुनीश्वर चले गये ॥२६॥ फिर कसारि भगवान् माता सुमति के द्वारा भले प्रकार लालित-पालित

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होते हुए शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होने लगे ॥३०॥ कल्केर्ज्येष्ठास्त्रय शूरा कवि प्राज्ञ सुमन्त्रका । पितृमातृप्रियकरा गुरुविप्रप्रतिष्ठिता ॥ ३१ ॥ कल्केरशा पुरो जाता. साधवो धर्म्मतत्परा । गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या ज्ञातयस्तदनुव्रता ॥ ३२ ॥ विशाखयूप भूपाल पालितास्तापवर्जिता । ब्राह्मणा कल्किमालोक्य परा प्रीतिमुपागता. ॥ ३३ ॥ ततो विष्णुयशा पुत्र धीर सर्वगुणाकरम् । कल्कि कमलपत्राक्ष प्रोवाच पठनाहृतम् ॥ ३४ ॥ तात ते ब्रह्मसस्कार यज्ञसूत्रमनुत्तमम् । सावित्री वाचयिष्यामि ततो वेदान्पठिष्यसि ॥ ३५ ॥ भगवान् कल्कि के उत्पन्न होने से पहले माता-पिता को प्रिय, गुरु-ब्राह्मण का हित करने वाले इनके तीन भाई और उत्पन्न हो चुके थे । उनके नाम कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्रक थे । भगवान् के ही अंश से उनकी जाति मे, उनके अनुगामी, साधु स्वभाव वाले एव धार्मिक प्रवृत्ति वाले गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि भगवान् से पहिले ही उत्पन्न हो चुके थे ॥३१-३१॥ विशाखयूप-नरेश द्वारा परिपालित यह सभी ब्राह्मण भगवान् का दर्शन करके सम्पूर्ण पाप-ताप से छूटकर अत्यत हर्षित हुए ॥३३॥ फिर अपने कमलनयन एव सर्वगुण सम्पन्न पुत्र को अध्ययन करने के योग्य वय वाला हुआ देखकर विष्णुयश उनसे बोले ॥३४॥ हे पुत्र ! मै तुम्हारा श्रेष्ठ ब्रह्म सस्कार, उपनयन और सावित्री का श्रवण कराऊँगा, फिर तुम वेदाध्ययन करना ॥३५॥ को वेद का च सावित्री केन सूत्रेण सस्कृताः । ब्राह्मणा विदिता लोक तत्तत्त्व वद तात माम् ॥ ३६ ॥ वेदो हरेर्वाक् सावित्री वेदमाता प्रतिष्ठिता ।

( २७१ ) त्रिगुणञ्च त्रिवृत्सूत्र तेन विप्रा प्रतिष्ठिता ॥ ३७ ॥ दशयज्ञै सस्कृता ये ब्राह्मणा ब्रह्मवादिन । तत्र वेदाश्च लोकाना त्रयाणामिह पोषका ॥ ३८ ॥ यज्ञाध्ययन दानादि तप स्वाध्याय सयम । प्रीणयन्ति हरि भक्त्या वेद तन्त्र विधानत ॥ ३६ ॥ तस्माद्यथोपनयन कर्मणोऽह द्विजै सह । सस्कत्तु बान्धवजनैस्त्वामिच्छामि शुभे दिने ॥ ४० ॥ पिता के वचन सुनकर कल्कि भगवान् ने पूछा—वेद क्या है । सावित्री क्या है । किस सूत्र से सस्कारित पुरुष ब्राह्मण सज्ञक होता है ? हे तात ! यह सब मुझे बताइये ॥३६॥ पिता बोले—वेद भगवान् विष्णु की वाणी है, सावित्री ही प्रतिष्ठा एव वेद-माता है । त्रिगुण-सूत्र को त्रिवृत्ताकार करके धारण करने पर ब्राह्मण नाम से प्रतिष्ठित होता है ॥३७॥ तीनो लोको के पोषक एव दशयज्ञ द्वारा सस्कृत ब्रह्म- वादी जो ब्राह्मण है, उन्ही के पास वेद निवास करते है ॥३८॥ यही दश सस्कार वाले विप्र वेद, तन्त्र और शास्त्रादि के विधान से यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, स्वाध्याय, सयम आदि के सहित भक्ति करते हुए भगवान् को प्रसन्न करते है ॥३६॥ इसी लिए ब्राह्मणो, बाँधवो आदि के सहित किसी शुभ दिन मै तुम्हारा उपनयन सस्कार करना चाहता हू ॥४०॥ के च ते दश सस्कारा ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठिता । ब्राह्मणा केन वा विष्णुमर्चयन्ति विधानत ॥ ४१ ॥ ब्रह्मण्या ब्राह्मणाज्जातो गर्भाधानादिसस्कृत । सन्ध्यात्रयेण सावित्री-पूजा-जप-परायणः ॥ ४२ ॥ तपस्वी सत्यवाग्धीरो धर्मात्मा त्राति ससृतिम् । विष्ण्वर्चनमिद ज्ञात्वा सदानन्दमयो द्विज ॥ ४३ ॥ कुत्रास्ते स द्विजो येन तारयत्यखिल जगत् । सन्मार्गेण हरिप्रीणान्कामदोग्धा जगत्त्रये ॥ ४४ ॥

( २७२ ) कल्कि भगवान् बोले—ब्राह्मण के लिए निश्चित किये गये वे दश-सस्कार कौन-कौन से है ? किस विधान से ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना किया करतें है ? ॥४१॥ विष्णुयश बोले—हे पुत्र ! ब्राह्मण के द्वारा ब्राह्मणी मे गर्भाधान सस्कार आदि से सस्कृत, त्रिकाल सध्या एव सावित्री की पूजा और जप मे परायण, तपस्वी, सत्यवक्ता, धीर धर्मात्मा ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना विधि को भले प्रकार जानकर आनन्द मे निमग्न रहता हुआ सदैव इस सृष्टि क रक्षक होता है ॥४२-४३॥ भगवान् ने कहा-हे तात ! जो ब्राह्मण सम्पूर्ण विश्व का उद्धारक, साधुमार्ग-परायण, भगवान् विष्णु को उपासना द्वारा प्रसन्न करने वाला और तीनो लोको की कामना पूर्ण करने वाला है, वह ब्राह्मण कहाँ है ? ॥४४॥ कलिना बलिना धर्म घातिना द्विज पातिना । निराकृता धर्मरता गता वर्षान्तरान्तरम् ॥ ४५ ॥ ये स्वल्पतपसो विप्रा स्थिता कलियुगान्तरे । शिश्नोदरभृतोऽधर्मनिरता विरत क्रिया ॥ ४६ ॥ पापसारा दुराचारास्तेजोहीना कलाविह । आत्मान रक्षितु नैव शक्ता शूद्रस्य सेवका ॥ ४७ ॥ इति जनकवचो निशम्य कल्कि. कलिकुलनाशमनोऽ भिलाषजन्मा द्विजनिजवचनैस्तदोपनीतोगुरुकुलवासमुवास साधुनाथ. ॥ ४८ ॥ पिता बोले—धर्मघाती और ब्राह्मणो के हिंसक महाबली कलि के द्वारा पीडित हुये विप्र गण अन्य देश को चले गये ॥४५॥ स्वल्प तप वाले जो ब्राह्मण इस कलिकाल मे यहाँ स्थित रहे, वे सब शिश्नो- दर धर्मी होकर धर्म और कर्म से विरत हो गये ॥४६॥ पाप युक्त, दुराचारी एव तेज-रहित ब्राह्मण इस कलिकाल मे आत्म-रक्षा मे अशक्त एव शूद्रो के सेवक बन गये है ॥४७॥ पिता के यह वचन सुन कर कल्कि भगवान् ने कलि को नष्ट करने का निश्चय किया । ब्राह्मणो ने अपनी वाणी द्वारा उनका उपनयन सस्कार किया । और तब भगवान् कल्कि गुरुकुल में निवास हेतु गये ॥४८॥

तृतीय अध्याय ततो वस्तु गुरुकुले यान्त कल्किं निरीक्ष्य स । महेन्द्राद्रिस्थितो रामः समानीयाश्रम प्रभु ॥१॥ प्राह त्वा पाठयिष्यामि गुरुं मा विद्धि धर्मत' । भृगु वंश समुत्पन्न जामदग्न्य महाप्रभुम् ॥२॥ वेद वेदाङ्ग तत्वज्ञ धनुर्वेद विशारदम् । कृत्वा निःक्षत्रिया पृथिवी दत्वा विप्राय दक्षिणाम् ॥३॥ महेन्द्राद्रौ तपस्तत्तु मागतोऽहद्विजात्मज । त्व पठात्र निज वेद यच्चान्यच्छास्त्रमुत्तमम् ॥४॥ इति तद्वच आश्रुत्य सप्रहृष्टतनूरूह । कल्कि. पुरो नमस्कृत्य वेदाधीतो ततोऽभवत् ॥५॥ सूतजी बोले — भगवान् कल्कि को गुरुकुल वास के लिए जाते देख कर महेन्द्र पर्वत निवासी परशुराम उन्हे अपने आश्रम मे ले गये ।१। वहाँ पहुँच कर परशुराम ने उनसे कहा—मैं भृगु वंश मे उत्पन्न, महर्षि जमदग्नि का पुत्र, वेद-वेदांग के तत्व की जानने वाला, धनुर्वेद-विद्या- विशारद परशुराम हूँ ।२। मैंने इस पृथिवी को क्षत्रिय-विहीन करके ब्राह्मणो को दक्षिणा स्वरूप दे डाली थी । अब तुम मुझे धर्म पूर्वक गुरु मानो, मैं तुमको शिक्षा दूँगा । हे द्विजात्मज ! मैं इस महेन्द्र पर्वत पर तपस्या करने के लिए आया हूँ, तुम यहाँ अपना वेदाध्ययन करो तथा अन्य जो भी कोई शास्त्र पढना चाहो, उसे पढो ।३-४। यह सुन कर भगवान् कल्कि ने आनन्द से गद्गद् होकर परशुराम को प्रणाम किया और फिर वेदाध्ययन करने लगे ।५। २७३