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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

तृतीय अंश: अध्याय १-३ (सत्ययुग पुनर्स्थापना व सूर्य-चन्द्रवंश वर्णन)

४३४ ] [ कल्कि पुराण चरणारविन्दो के पूजन किये बिना उनकी शोभा नही हो सकती ।६। हे जगद्रूप ! सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, मधुर वाणी से विभूषित, सुरम्य चेष्टा से युक्त आपका यह मुख यदि हमारा प्रिय नही करना चाहेगा तो हमारी तत्काल मृत्यु ही हो जायगी ।१०। हयचरभयहरकरहरशरणाखरतरवरदशबलमदन । जयहतपरभरभवरणनशनशशधरशतसमरसभरवदन ।।११।। इति तस्याः सुशान्ताया गीतेन परितोषित । उत्तस्थौ रणशय्याया. कलिर्युद्धस्थवीरवत् ।।१२।। सुशान्ता पुरतो दृष्ट्वा कृत वामे तु दक्षिणे । धर्मं शशिध्वज पश्चात्प्राहोऽति व्रीडितानन ।।१३।। का त्व पद्मपलाशाक्षि ! मम सेवार्थमुद्यता । कान्ते शशिध्वज. शूरो मम पश्चादुपस्थित ।।१४।। हे धर्म्म ! हे कृतयुग ! कथमत्रागता वयम् । रणाङ्गण विहायास्याः शत्रोरन्त पुरे वद ।।१५।। आप अश्वारोही सब को अभय देते हुए विचरते हैं ? आपके तीक्ष्ण बाणो के प्रहार से जो वीर पुरुष युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका आप ही प्रतिपालन करते हैं । आपके मुख मण्डल पर सैकडो चन्द्रमाओ की आभा चमकती है । शिव और ब्रह्मा भी सदा आपके आश्रय की याचना करते रहते हैं ।११। सुशान्ता द्वारा किये गये इस प्रकार के विनय-गान से सन्तुष्ट होकर कलिजी उसी प्रकार उठ पडे, जिस प्रकार रणक्षेत्र मे मूर्च्छित वीर उठ जाता है ।१२। उन्होने अपने सामने रानी शान्ता को, वाम पार्श्व मे सत्युग और दक्षिण पार्श्व मै धर्म को और अपने पीछे राजा शशिध्वज को खडे देखा तो लज्जा से मुख नीचा करके बोले ।१३। हे कमलपत्र जैसे नेत्र वाली ! तुम कौन हो और मेरी सेवा में क्यों तत्पर हुई हो ? यह बलवान् राजा शशिध्वज मेरे पीछे क्यो उपस्थित है ? ।१४। हे धर्म ! हे सत्युग ! हम युद्ध क्षेत्र

दशम अध्याय ] ४३५ को छोड़ कर शत्रु के अन्तःपुर मे क्यो आ गये यह ? सब मुझे बताओ ।१५। शत्रुपत्न्य कथं साधु सेवन्ते मामरिं मुदा । शशिध्वज, शूरमानी मूर्च्छित हन्ति नो कथम् ॥१६॥ पाताले दिवि भूमौवा नरनागसुराऽसुराः । नारायणस्य ते कल्के केवा सेवा न कुर्वते ॥१७॥ यत्सेवकाना जगता मित्राणा दर्शनादपि । निवर्तन्ते शत्रुभावस्तस्य साक्षात्कृतो रिपुः ॥१८ त्वया सार्द्धं मम पतिः शत्रुभावेन संयुगे । यदि योग्यस्तदानेतुं कि समर्थो निजालयम् ॥१९॥ तत दासो मम स्वामी अह दासी निजा तव । आवयो. सप्रसादाय आगतोऽसि महाभुज ॥२०॥ मुझे शत्रु की यह शत्रु-पत्नियाँ प्रसन्न होती हुई क्यो परिचर्या कर रही हैं ? जब मैं मूर्च्छित हो गया था, तब इन शूर एव मानी राजा शशिध्वज ने मेरा सहार क्यो नही कर दिया ? ।१६। रानी बोली- पाताल, स्वर्ग अथवा पृथिवी पर, नाग, सुर और असुर मे ऐसा कौन है जो भगवान् कल्कि की सेवा नही करता ? ।१७। संसार जिनका सेवक और मित्र है तथा जिनके दर्शन मात्र से शत्रु भाव नष्ट हो जाता है, क्या उनका कोई प्रत्यक्ष रूप से कभी शत्रु हो सकता है ? ।१८। मेरे पति यदि आपके प्रति शत्रु-भाव रख कर आपसे युद्ध करते तो क्या वह आपको अपने घर मे इस प्रकार ले आते ? ।१९। हे महाभुज ! मेरे पति आपके दास हैं, इसलिए मैं भी आपकी दासी हूँ । इस प्रकार हम पर प्रसन्न होकर ही आप स्वयं यहाँ पधारे हैं ।२०। अह तवैतयोर्भक्तया नामरूपानुकीर्तनात् । कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कलिकेव ॥२१॥ अधुनाह कृतयुग तव दासस्य दर्शनात् । त्वमोध्वरो जगत्पूज्यसेवकस्यास्य तेजसा ॥२२॥

४३६ ] [ कल्कि पुराण दण्डय मा दण्डय विभो योद्धृन्त्वादुद्यतायुधम् । येन कामादिरागेणत्वय्यात्मन्यपि वैरिना ॥२३॥ इति कल्किर्वचस्तेषा निशम्य हसितानन । त्वया जितोऽस्मीति नृप पुन पुनरुवाच ह ॥२४॥ ततः शशिध्वजो राज युद्धादाहूय पुत्रकान् । सुशान्ताया मति बुद्ध्वा रमा प्रादात्सकल्कये ॥२५॥ धर्म ने कहा — हे कलि का नाश करने वाले कल्किजी ! यह राजा-रानी दम्पति जिस प्रकार आपकी भक्ति करते हुए आपका नाम- संकीर्त्तन एव स्तोत्र करते है, उसे देख कर मैं कृतार्थ हो गया— कृतार्थ हो गया ।२१। सत्युग बोला — हे प्रभो ! आज आपके इस सेवक का दर्शन पाकर तो अवश्य ही मेरा सत्युग नाम यथार्थ हो गया । इस सेवक ने अपने तेज से आपको भी जगत्पूज्यत्व और ईश्वरत्व से परिपूर्ण कर दिया ।२२। राजा शशिध्वज बोले — हे जगदीश्वर ! मैने काम क्रोध आदि विषयो के वशीभूत होकर ही आप ईश्वर एव साक्षात् अपने आत्मा के प्रति शत्रुता करके आपके देह पर अस्त्र प्रहार किया है ।२३। राजा के वचन सुन कर कल्किजी ने मुसकराते हुए बारम्बार कहा— हे राजन् ! आपने मुझे सब प्रकार जीत लिया है ।२४। इसके पश्चात् राजा शशिध्वज ने रणभूमि से अपने पुत्रो को वापिस बुला लिया और फिर रानी सुशान्ता की प्रेरणा से अपनी रमा नाम की कन्या कल्किजी को प्रदान कर दी ।२५। तदैत्य मरुदेवापी शंशिध्वजसमाहृतौ । विशाखयूपभूपश्च रुधिराश्वश्च संयुगात् ॥२६॥ श्याकशांनृपेणापि भल्लाटं पुरमाययुः । सेनागणैरसंख्यातैः सा पुरी मर्दिताभवत् ॥२७॥ गजाश्वरथसबाधैः पत्तिच्छत्ररथध्वजैः । कल्किनापि रमायाश्च विवाहोत्सवसम्पदाम् ॥२८!

दशम-अध्याय ] ४३७ द्रष्टु समीयुस्त्वरिता हर्षात्सबलबाहनाः । शंखभेरी मृदङ्गाना वादित्राणाञ्च निस्वनैः ॥२६॥ नृत्यगीतविधानैश्च पुरस्त्रीकृतमङ्गलैः । विवाहो रमयाकल्केरभूदतिसुखावहः ।३०। उस अवसर पर मरु, देवापि, विशाखयूपनरेश और रुचिरारव आदि सभी कल्कि-पक्ष के राजागण शशिध्वज द्वारा आमन्त्रित किये गये । वे सब राजा शय्याकरण को साथ लेकर रणभूमि से भल्लाट नगरी मे आ पहुँचे । उस समय असंख्य कल्कि-सेना के पाँवो से वह नगरी मर्दित्ता हो गई। २६-२७। गज, अश्व, रथ, पदाति, छत्र और रथ की ध्वजाएँ आदि सभी से सुशोभित विवाह मण्डप मे कल्किजी और रमा का विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ ।२८। हर्ष से प्रफुल्लित हुए सभी व्यक्ति अपने दल बल और वाहनो के सहित उस उत्सव को देखने के लिए वहाँ आये । राजकुमारी रमा का विवाह शंख, भेरी, मृदंग आदि वाद्यो की सुमधुर ध्वनि और पुर-नारियो के श्रेष्ठ मङ्गलाचारो तथा नृत्य-गीतादि के सानन्द सम्पन्न हुआ । २६-३०। नृपा नानाविधैर्भोज्यै पूजिता विविशु सभाम् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चावरजातयः ॥३१॥ विचित्रभोगाभरणाः कल्कि द्रष्टुमुपाविशन् । तस्या सभाया शुशुभे कल्कि कममलोचनः ॥३२॥ नक्षत्रगणमध्यस्थ पूर्ण शशधरो यथा । रेजे राजगणाधीशो लोकान्सर्वाग्विमोहयन् ।६६। रमापति कल्किमवेक्ष्य भूप सभागत पद्मदलायतेक्षणम् । जामातर भक्तियुतेन कर्मणा विबुध्य मध्ये निषसाद तत्रह ।३४ विविध प्रकार भोज्य एव पान-पदार्थों से सत्कार प्राप्त करते हुए राजागण सभा मे प्रविष्ट हुए । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रीदि

४३८ ] कल्कि पुराण सभी वर्ण के लोग अद्भुत आभूषणो और विविध प्रकार की भोग- सामग्रियो को प्राप्त करके उस सभा मे सुशोभित कल्किजी के सब ओर बैठ कर शोभा को प्राप्त होने लगे ।३१-३२। जैसे तारागण के मध्य पूर्ण चन्द्र की अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही सब लोगो के मध्य मे सुशोभित राजाओ के भी स्वामी कल्किजी सब लोको को मोहित करने लगे ।३३। पद्म पलाश जैसे नेत्र वाले कल्किजी ने सभा मे उपस्थित राजाओ आदि के समक्ष रमा का पाणिग्रहण किया। उस समय राजा शशिध्वज भी कल्किजी को जामाता-भाव से देखते हुए भक्ति-युक्त हृदय से सभा मे अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुए ।३४।

तृतीयांश— एकादश अध्याय तत्राहूस्ते सभामध्ये वैष्णव त शशिध्वजम् । मुनिभि कथिताशेष-भक्तिव्यासक्तविग्रहम् ॥१॥ सुशान्ताञ्च कृतेनापि धर्मेण विधिद्युताम् । २॥ युंवा नारायणास्यास्य कल्केः श्वशुरता गतौ । वय नृपा इमे लोका ऋषयो ब्राह्मणाश्च ये ॥३॥ प्रेक्ष्य भक्तिवितान वा हरौ विस्मितमानसा. । पृच्छामस्त्वामिय भक्ति क्व लब्धा परमात्मनः ॥४॥ कस्य वा शिक्षिता राजन् ! किंवा नैसर्गिकी तव । श्रोतुमिच्छामहे राजन् ! त्रिजगज्जतपावतीम् । कथा भागवती त्वत्तः संसाराश्रमनाशिनीम् ॥५॥ सूतजी ने कहा—मुनियो के द्वारा अशेष कहे गए भक्तिमय देह वाले, विष्णु भक्त, धर्म और सत्युग के साथ स्थित एव रानी सुशान्ता के सहित शोभायमान् राजा शशिध्वज की ओर देखते हुए आगत राजा आदि व्यक्तियो ने कहा। १-२। राजागण बोले—अब आप साक्षात् नारायण के अवतार भगवान् कल्कि के श्वसुर-पद को प्राप्त हुए हैं। परन्तु हम सब राजागण, ऋषिगण और विप्रगण तथा अन्यान्य सभी उपस्थितजन आपकी भक्ति को ऐसे विस्तृत रूप मे देख कर अत्यन्त आश्चर्य को प्राप्त हुए हैं। हम आपसे यह पूछते है कि परमात्मा की ४३६

४४० ] [ कल्कि-पुराण यह शक्ति आपको किस प्रकार उपलब्ध हो सकी ? ।३४। हे राजन् ! इस भक्ति की क्या आपने किसी से शिक्षा प्राप्त की है ? अथवा यह भक्ति आप मे स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो गई है ? हे राजन् ! आपकी इस भगवद्भक्ति का कारण सुनने की हमे जिज्ञासा है। क्योकि भगवद्भक्ति की यह कथा ससार के आवागमन को नाश करने वाली है ।५। स्त्रीपुंसोवयोरेस्तत्तच्छृणुतामोघविक्रमा । वृत्तं यज्जन्मकर्मादि स्मृति तद्भक्तिलक्षणम् ॥६॥ पुरा युगसहस्रान्ते गृध्रोऽह पूतिमासभुक् । गृध्रीय मे प्रियारख्ये कृतनीडो वनस्पतौ ॥७॥ चचार काम सर्वत्र वनोपवनसकुले । मृताना पूतिमांसौधै प्राणिना वृत्तिकल्पकौ ॥८॥ एकादा लुब्धक क्रूरो लुलोभ पिशिताशिनौ । आवा वीक्ष्य गृहे पुष्ट गृध्र तत्राप्ययोजयत् ॥६॥ त वीक्ष्य जातविश्रम्भौ क्षुधया परिपीडितौ । स्त्रीपु सौ पतितौ तत्र मासलोभितचेतसौ ॥१०॥ इस पर राजा शशिध्वज बोले—हे राजाओ ! हम दोनो पति- पत्नी के जो जन्म, कर्म आदि हैं तथा जिस प्रकार हम को भगवद्भक्ति का स्मरण हुआ, वह सब आप सुनिये ।६। एक सहस्र युग पहले की बात है—मैं मांसाहारी गृद्ध था और मेरी यह प्रिया सुशान्ता मेरी पत्नी गृद्धिनी थी । हम दोनो एक विशाल वृक्ष पर नीड बना कर उसमे रहते थे ।७। वन-उपवन आदि स्थानो मे हमारी इच्छानुसार अबाध गति थी । उस समय हम मरे हुए प्राणियो के दुर्गंधित मांस से अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे ।८। एक दिन एक क्रूर व्याध ने हमे देख लिया और लोभवश हमे पकडने के लिए उसने अपने पालित गृद्ध को हमारे समक्ष छोड दिया ।६। मैं क्षुधा से व्याकुल था, तभी मैने उसे देखा मांस के लोभ से हम स्त्री-पुरुष दोनो ही उस पर झपट पडे ।१०। बद्धावावां वीक्ष्य तदा हर्षादागत्य लुब्धकः । जग्राह कण्ठे तरसा चञ्च्वाघातात्पीडित ॥११॥

एकादश अध्याय ] [ ४४१ आवां गृहीत्वा गण्डक्याः शिलायां सलिलान्ति के । मस्तिष्कं चूर्णयामास लुब्धकः पिशिताशनः ॥१२॥ चक्राङ्कितशिलागङ्गामरणादपि तत्क्षणात् । ज्योतिर्मयविमानेन सद्यो भूत्वा चतुर्भुजौ ॥१३ प्राप्तौ वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनस्कृतम् । तत्र स्थित्वा युगशतं ब्रह्मणो लोकमागतौ ॥१४॥ ब्रह्मलोके पञ्चशतं युगानामुपभुज्य वै । देवलोके कालवशाद्गतं युगचतुःशतम् ॥१५॥ व्याध ने हम दोनो को अपने जाल मे बँधा हुआ देखा तो वह प्रसन्न होता हुआ शीघ्रता से हमारे पास आया और उसने हमारे कण्ठ पकड लिये । तब हम भी उस पर अपनी चोचो से आघात करने लगे ।११ तदनन्तर मांस के लोभी उस व्याध ने हम दोनो को पकड कर गण्डकी में स्थिति एक शिला पर पछाड-पछाड कर हमारे मस्तको को चूर्ण कर डाला ।१२। गङ्गा का किनारा और चक्राङ्कित शिला— मरण काल् मे इन दोनो क ।सान्निध्यता के प्रभाव से हम उसी समय चतुर्भुज रूप हो गये और तेजस्वी विमान मे चढ कर सब लोको के द्वारा नमस्कृत बैकुण्ठ लोक मे जा पहुँचे । वहाँ सौ युगो तक निवास करने के पश्चात् हमको ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुई ।१३-१४। उस ब्रह्मलोक मे पाँच सौ युगो तक सुख भोगने के पश्चात् काल के वश में पड कर देवलोक में गये और चार सौ युगों तक वहाँ सुख भोगते रहे ।१५। ततो भुवि नृपास्तावद्वद्धसूनुरहं स्मरन् । हरेनुगृहं लोकं शालग्रामशिलाश्रमम् ॥१६॥ जातिस्मरत्वं गण्डक्याः किं तस्याः कथयाम्यहम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण महात्म्यं महदद्भुतम् ॥१७॥ चक्रांकितशिलास्पर्शमरणस्येदृशं फलम् । न जाने वासुदेवस्य सेवया किं भविष्यति ॥१८॥ इत्यावाहहरिपूजासु सर्षविह्वलचेतसौ ।

नृत्यन्तावगायन्तौ विलुठन्तौ स्थिताविह ॥१६॥ कल्केर्नारायणांशस्य अवतार, कलिकक्षयः । पुरा विदितवीर्यस्य पृष्टो ब्रह्ममुखाच्छ्रुत ॥२०'| हे राजागण ! फिर अब हम इस मर्त्यलोक मे उत्पन्न हुए हैं। परन्तु हमें शालग्राम शिला का वह स्थान और भगवान् विष्णु की कृपा का अभी तक स्मरण है ।१६। क्योंकि गण्डकी नदी के तट पर मरण होने पर जन्मो की स्मृति कभी नष्ट नही होती । यह अद्भुत माहात्म्य उस नदी के जल-स्पर्श का ही है ।१७। यदि उस चक्राङ्कित शिला के स्पर्श मात्र से मृत्यु के पश्चात् ऐसा शुभ फल होता है, तो भगवान् वासु- देव की सेवा के फल का तो कहना ही क्या है ? ।१८। यही सोचते हुए हम कभी हरि-पूजन मे अपने चित्त को एकाग्र करते हैं, कभी हर्ष से विह्वल होकर नृत्य करने लगते हैं, कभी उनका गुण-गान करते और भक्ति भाव मे मग्न हो ज ते हैं ।१९। यह समाचार हमे श्री ब्रह्माजी द्वारा पहिले ही मिल गया था कि कलियुग का क्षय करने के लिए भगवान् नारायण का अंशावतार होगा । इस प्रकार हम इनके पराक्रम को भले प्रकार जानते हैं ।२०। इति राजसभायां स. श्रावयित्वा निजा कथाः । ददौ गजानामयुतमश्वाना लक्षमादरात् ॥२१ रथानां षट्सहस्रन्तु ददौ पूर्णस्य भक्तितः । दासीनां युवतीनाञ्च रमानाथाय षट्शतम् ॥२२॥ रत्नानि च महार्घाणि दत्त्वा राजा शशिध्वजः । मेने कृतार्थमात्मान स्वजनैर्बान्धवैः सह ॥२३॥ सभासद इतिश्रुत्वा पूर्वजन्मोदिताः कथाः । विस्मयाविष्टमनसः पूर्णं त मेनिरे नृपम् ।२४। कल्कि स्तुवन्तो ध्यायन्तो प्रशंसन्त जगज्जना । पुनस्तमाहूराजान लक्ष्या भक्तिभक्तयोः ।२५। इस प्रकार उस सभा में अपना पूर्व प्रसंग कह कर राजा शशि- ध्वज ने भक्ति-भाव पूर्वक कल्किजी को दस सहस्र गज, एक लाख अश्व,

एकादश अध्याय ] [ ४४३ छ सहस्र रथ, छः सो युवती दासियां तथा असख्य रत्नादि प्रदान करके अपने स्वजनो और बांधवो के सहित अपने को धन्य माना। २१-२३। राजा शशिध्वज के मुख से उनके पूर्व जन्म का वृत्तान्त सुन कर सभी सभासद् आश्चर्य चकित होकर उन्हे पूर्ण समझने लगे २४। फिर वहाँ उपस्थित सभी जन कल्किजी का भक्तिपूर्वक ध्यान करने लगे। फिर उन्होने भक्तो के लक्षण विषयक प्रश्न राजा शशिध्वज से किया। २५। भक्तिकाम्यद्भगवतः को वा भक्तो विधानवित् । किं करोति किमश्नाति क्त्वा वसति वक्ति किम् । २६। एतान्वर्गान् राजेन्द्र ! सर्वं त्व वेत्सि सादरात् । जातिस्मरत्वात्कृष्णस्य जगता पावनेच्छया । २७। इति तेषा वच. श्रुत्वा प्रफुल्लवदनो नृप । माधुवादे समामन्त्र्य तानाह ब्रह्मणोदितम् । २८। पुरा ब्रह्मसभामध्ये महर्षिगणसङ्कुले । सनकोनारद प्राह भवद्भिर्यास्तिवहोदिताः । २९। तेषामनुग्रहेणाह तत्रोषित्वा श्रुताः कथाः । यास्ता सकथयामीह शृणुध्व पापनाशना. । ३०। राजागण बोले—भगवद्भक्ति क्या है ? विधान के जानने वाला भक्त कौन कहा जाता है ? भक्त का कार्य क्या है ? वह क्या खाता, क्या वार्तालाप करता और कहाँ रहता है ? । २६। हे राजेन्द्र ! आपको सब कुछ विदित है, इस लिए आप कृपया आदरपूर्वक सब बात हमे बतावे । उनकी बात मुन कर राजा शशिध्वज ने हर्षित मुख से उन्हे साधुवाद दिया । फिर जाति स्मरण होने के कारण श्री कृष्ण चरित्र द्वारा ससार को पवित्र करने के उद्देश से उन्होने वह सब कहना आरम्भ किया, जो उन्होने ब्रह्माजी के मुख से सुना था । २७-२८। शशिध्वज बोले पुराकाल की बात है—ब्रह्माजी की सभा के मध्य महर्षिगण विराजमान थे, उसी अवसर पर जो कुछ सनकादि ने नारदजी से पूछा था, वही आपको बताता हूँ । २६। उस समय मैं भी वहाँ उपस्थित था, इसलिए

४४४ ] [ कल्कि पुराण उनकी कृपा से मैंने उस सब प्रसग को सुना था। हे पापनाशन उप- स्थित सज्जनो ! जो बात मैंने सुनी थी। वही कहता हूँ, आप लोग सुनिये ।३०। का भक्ति संसृतिहरा हरौ लोकनमस्कृता । तामादौ वर्णय मुने नारदावहिता वयम् ।३१। मन षष्ठानीन्द्रियाणि संयम्य परया धिया । गुरावपि न्यसेद्देहं लोकतन्त्रविचक्षणः ।३२। गुरौ प्रसन्ने भगवान्प्रसीदति हरिः स्वयम् । प्रणवाग्निप्रियामध्ये मवरण तन्निदेशतः ।३३। स्मरेदनन्यया बुध्‍या देशिकं सुसमाहितः । पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः ।३४। पूजयित्वा वासुदेवपादपद्मं समाहितः । सर्वाङ्गसुन्दरं रम्यं स्मरेद्धृत्पद्ममध्यगम् ।३५। सनक ने कहा—हे मुने ! हे नारद ! किस प्रकार की हरि-भक्ति से जन्म नही लेना होता तथा कौन सी भक्ति प्रशसा के योग्य है। आप उसी को पहले कहिये। हम सुनने के इच्छुक हैं ।३१। नारद बोले— लोकतन्त्र के ज्ञाता साधक को श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा पांचो ज्ञानेन्द्रिय और छठवे मन का निग्रह करते हुए ज्ञाना-श्रय पूर्वक गुरु के चरणो मे अपना शरीर अर्पण कर देना चाहिये ।३२। क्योकि गुरु के प्रसन्न होने पर भगवान् श्रीहरि भी प्रसन्न होते हैं । प्रथम प्रणवाग्नि प्रिया के मध्य मे ॐ, का अनन्य हृदय से स्मरण करे । फिर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि तथा स्नान और वस्त्राभूषणो से युक्त होकर सावधान चित्त से नारायण के चरणारविन्दो का पूजन करे । तदनन्तर हृत्पद्म के मध्य में प्रतिष्ठित सुरम्य और सर्वांग सुन्दर श्रीहरि के स्वरूप का चिन्तन करे ।३३-३५। एव ध्यात्वा वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियगणैः सह । आत्मानमर्पयेद्विद्वान्हरावेकान्तभाववित् ।३६।

एकादश अध्याय ] ४४५ अङ्गानि देवास्तेषान्तु नामानि विदितान्युत । विष्णो कल्केरन्तस्य तान्येवान्यन्न विद्यते ।३७। सेव्य. कृष्ण सेवकोऽहमन्ये तस्यात्ममूर्त्त य । अविद्योपाधयो ज्ञानद्वदन्ति प्रभावदयः ।३८। भक्तस्यापि हरौ द्वैतं सेव्यसेवकवत्तदा । नान्याद्विना तमित्येव क्वच किञ्चन विद्यते ।३६। भक्त. स्मरति त विष्णु तन्नामानि च गायति । तत्कर्माणि करोत्येव तदानन्दसुखोदय ।४०। इस प्रकार ध्यान करने के पश्चात् वाणी, मन, बुद्धि ओर इन्द्रियो के सहित स्वयं को श्रीहरि मे समर्पित कर दे ।३६। भगवान् कलिक परमदेव एण अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु के अग हैं । जो सब नाम आपको विदित है, वह भगवान् श्रीहरि के अतिरिक्त और कुछ भी नही है ।३७। भगवान् श्री कृष्ण सेव्य और मैं उनका सेवक हूँ तथा ससार भर के सभी प्राणी उन्ही के मूर्त्त रूप हैं । ज्ञानियो का कहना है कि अविद्यारूपी उपाधि के वश मे पड कर ही यह सब उत्पन्न होते हैं ।३८। भक्तो के निमित्त सेव्य-सेवक भाव रूप द्वैत का आवि- र्भाव होता है। इस प्रकार श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नही है ।३६। उन्ही भगवान् विष्णु का भक्त सदा स्मरण करता, नाम-गुण कीर्त्तन करता तथा सभी कर्म उनके ही निमित्त किया करता है । इसी कारण उसके लिए आनन्द और सुख की उत्पत्ति होती है ।४०। नृत्यत्युद्धतवद्रौति हसति प्रैति तन्मन. । विलु ठत्यात्मविस्मृत्या न वेत्ति कियदन्तरम् ।४१। एवविधा भगवतो भक्तिरव्यभिचारिणी । पुनाति सहसा लोकान्सदेवासुरमानुषान् ।४२। भक्तिः सा प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मसम्पत्प्रकाशिता । शिवविष्णुब्रह्मरूपा वेदाद्याना वरापि वा ।४३। भक्ताः सत्वगुणाध्यासाद्रजसेन्द्रियलालसा. ।

४४६ ] [ कल्कि पुराण तमसा घोरसकल्पा भजन्ति द्ववैतदृग्जना ।४४। सत्त्वान्निर्गुणतोमति रजसा विषयस्पृहा । तमसा नरक यान्ति ससाराद्वैतधर्मिणि ।४५। वह विह्वल होकर नाचता, रोता हँसता और तन्मयतापूर्वक विचरण करता है। वह स्वय को भूल कर भक्ति-भाव मे ही डूब जाता है और हरि के अतिरिक्त कही कुछ नही जानता ।४१। यही भगवान् की अव्यभिचारिणी भक्ति है, इसी के प्रभाव से देवता, दैत्य और मनुष्य आदि की सम्पूर्ण सृष्टि सहसा पवित्रता को प्राप्त होती है ।४२। नित्या प्रकृति अथवा ब्रह्म की सम्पदा ही भक्ति रूप मे प्रकट होती है। वही भक्ति वेदादि मे श्रेष्ठ एव शिव, विष्णु और ब्रह्मा स्वरूपिणी है ।४३। सत्वगुण के अभ्यास से युक्त द्वैत के जानने वाले मनुष्य इन्द्रिय व्यापार की इच्छा वाले होते हैं और जो तमोगुण से युक्त हैं वे घोर कार्यों का सकल्प किया करते हैं ।४४। द्वैत ज्ञान से युक्त ज्ञानीजन सत्वगुण के व्याप्त होने पर निर्गुणता को प्राप्त होते हैं तथा रजोगुण के व्याप्त होने पर विषयो मे लग जाते हैं और यदि तमोगुण की अधिकता होती है तो वे पुरुष नरक को प्राप्त होते हैं ।४५। उच्छिष्टमवशिष्टं वा पथ्य पूतमभीप्सितम् । भक्ताना भोजनं विष्णोर्नैवेद्यं सात्विक मतम् ।४६। इन्द्रियप्रीतिजनन शुक्रशोणितवर्द्धनम् । भोजनं राजस शुद्धमायुरारोग्यवर्द्धनम् ।४७ अतः परं तामसानां कट्वम्लोष्णविदाहिंकम् । पूतिपर्युषित ज्ञेय भोजनं तामसप्रियम् ॥४८॥ सात्विकानां वनें वासो ग्रामे वासस्तु राजसः । तामसं द्यूतमद्यादिसदनं परिकीर्तितम् ॥४६॥ न दाता स हरिः किञ्चित्सवेकस्तुन याचकं । तथापि परमा प्रीतिस्तयोः किंमिति शाश्वती ॥५०॥

एकादश अध्याय ] [ ४४७ इत्येवद्भगवत ईश्वरस्य विष्णोगुंणकथन सनको विबुध्य भक्त्या सविनयवचनैः सुरर्षिवर्य परिणुत्वेन्द्रपुर जगाम शुद्ध ॥५१॥ भगवान् का शेष बचा हुआ उच्छिष्ट (प्रसाद) तथा इच्छित नैवेद्य ही पवित्र पथ्य स्वरूप है। भक्तो को इसी सात्विक आहार का भोजन करना चाहिये (अर्थात् भोज्य सामग्री भगवान् को अर्पण करके ही प्रसाद रूप मे सेवन करनी चाहिए) ।४६। जो भोजन इन्द्रियो को सन्तुष्ट करने वाला, वीर्य एव रक्त वर्द्धक तथा परमायु के देने वाला एव आरोग्यप्रद है, ऐसा शुद्ध भोजन राजसी कहा जाता है ।४७। कडुवा, खट्टा, जलन करने वाला, दुर्गन्ध युक्त तथा वासी भोजन तामसी मनुष्यो को प्रिय है ।४८। सतोगुणी पुरुष वन में निवास करते हैं, रजोगुणी मनुष्य ग्राम मे और तमोगुणी द्यूत खेलने के अथवा मद्य पीने के स्थान मे रहते हैं ।४९। भगवान् स्वय अपना हाथ उठा कर किसी को कुछ प्रदान नही करते, और न सेवक ही उनसे कुछ याचना करता है। फिर भी उनमे परस्पर सदा ही परम प्रीति रहती है, यह कैसी विचित्र बात है ? ।५०। पवित्र मन वाले सनक भक्तिपूर्वक नारदजी के द्वारा भगवान् विष्णु का गुण-कथन सुन कर विनम्र वचनो से देवर्षिवर नारदजी की स्तुति और नमस्कार कर देवलोक को चले गये ।५१।

तृतीयांश — द्वादश अध्याय एतद्वः कथित भूपा. कथनीयोरुकर्मरण । कथा भक्तस्य भक्तेश्च किमन्यत्कथयाम्यहम् ॥१॥ त्व राजन्वैष्णवश्रेष्ठः सर्वसत्वहिते रत । तवावेश. कथ युद्धरङ्गे हिंसादिकर्मणि ॥२॥ प्रायशः साधवो लोके जीवाना हितकारिण. । प्राणबुद्धिधनैर्वाग्भि. सर्वेषा विषयात्मनाम् ॥३॥ द्वैतप्रकाशिनी या तु प्रकृतिः कामरूपिणी सा सूते त्रिजगत्कृत्स्न वेदाश्च त्रिगुणात्मिका ॥४॥ ते वेदास्त्रिजगद्धर्मशासना धर्मनाशना । भक्तिप्रवर्तका लोके कामिना विषयेषिणाम् ॥५॥ वात्स्यायनादिमुनयो मनवो वेदपारगा । वहन्ति बलिमीशस्य वेदवाक्यानुशासिताः ॥६॥ वय तदनुगाः कर्म धर्म निष्ठा रणप्रियाः । जिघासन्त जिघासामो वेदार्थकृतनिश्चया. ॥७॥ राजा शशिध्वर्ज बोले--हे राजाग्रो ! जिनके असाधारण कर्म कीर्तन के योग्य हैं, उन भक्तो और भक्ति का महात्म्य मैंने कह दिया है । अब और क्या कहूँ ? ।१। राजा बोले--हे राजन् ! आप सब जीवो के कल्याण करने मे तत्पर तथा वैष्णव श्रेष्ठ हैं। फिर आप हिंसादि दोषो से युक्त युद्ध करने मे क्यो प्रवृत्त होगये थे ।२। प्राय; साधुजन

द्वादश-अध्याय ] ४४६ विषयासक्त जीवो का हित साधन करने के कार्य में अपने प्राण, बुद्धि, धन तथा वाणी आदि सब कुछ लगा देते हैं ।३। शशध्वज बोले- त्रिगुणात्मिका प्रकृति ही द्वैतभाव को प्रकाशित करती है । सभी वेदो और तीनो लोको को उत्पन्न करने वाली यह प्रकृति कामरूपिणी है ।४। तीनो लोको मे नेद ही धर्म की व्यवस्था द्वारा अधर्म का नाश करते हुए विषयासक्त कामियो में भी भक्ति का प्रवर्त्तन करते हैं ।५। वेदो के ज्ञाता वात्स्यायन आदि मुनिगणो और मनुओ ने वेदवाणी के शासन को मानते हुए परमात्मा के हेतु बलि प्रदान की थी ।६। हम भी उन्ही का अनुगमन करते धर्म पूर्वक युद्ध मे तत्पर होते और वैदिक शिक्षा के अनुसार ही युद्ध मे आततायियो का संहार कर डालते हैं ।७। अवध्यस्य वधे यावांस्तावन्वध्यस्य रक्षणे । इत्याह भगवान्व्यास. सर्ववेदार्थतत्परः ॥८॥ प्रायश्चित्त न तत्रास्ति तत्राधर्मः प्रवर्त्तते । अतोऽत्र वाहिनी हत्वा भवता युधि दुर्जयाम् ॥६॥ धर्मं कृतञ्च कलिकन्तु समानीयागता वयम् । एषा भक्तिर्मम मता तवाभिप्रेतमीरय ॥१०॥ अह तदनुवक्ष्यामि वेदवाक्यानुसारतः । यदि विष्णु. स सर्वत्र तदा क हन्ति को हतः ॥११॥ हन्ता विष्णुर्हतो विष्णुर्वध. कस्यास्ति तत्र चेत् । युद्धयज्ञादिषु वधे न वधो वेदशासनात् ।१२। इति गायन्ति मुनयो मनवश्च चतुर्दश । इत्थं युद्धैश्च यज्ञैश्च भजामो विष्णुमीश्वरम् ।१३। अतो भागवती मायामाश्रित्य विधिना यजन् । सेव्यसेवकभावेन सुखी भवति नान्यथा ।१४। सर्व वेदार्थ के ज्ञानी भगवान् वेद व्यासजी का कथन है कि जो पाप-अवध्य के मारने में है वही वध योग्य का वध का न करने मे भी

४५० ] [ कल्कि-पुराण है। ८। इस प्रकार का आचरण न करना अधर्म है। उसका कोई प्राय- श्चित्त भी नही है। इसीलिए मै रणभूमि मे दुर्जय सेना के वध मे तत्पर होकर धर्म, सत्युग ओर कल्किजी को यहाँ ले आया। मेरे मत मे यही वास्तविक भक्ति है। इस विषय मे आपका अभिप्राय जो हो, वह बताइये ।६-१०। इसके अतिरिक्त मैं वेद-वाणी के अनुसार ही कहता हूँ कि भगवान् विष्णु सर्व-व्यापी हैं। यदि यह यथार्थ है तो फिर कौन किसी को मारता है और कौन मरता है ? ।११। जब मारने वाले विष्णु हैं, और मरने वाले भी विष्णु ही हैं, तो किसका वध हो सकता है ? फिर वेद की ही व्यवस्था है कि युद्ध आदि कर्मों मे जो वध होता है, वह वध नही माना जाता ।१२। यही बात चौदह मनुओ और मुनियो ने भी कही है। हम भी इसी के अनुसार यज्ञो और युद्धो के द्वारा भगवान् विष्णु का पूजन किया करते है। १३। इस प्रकार भगवती माया के आश्रय मे स्थित हुआ साधक विधिवत् सेव्य-सेवक भाव से भगवान् का यजन करके सुखी होता है, अन्य कोई विधि सुख-प्राप्त करने की नही है ।१४। निमेर्भू'पस्य भूपाल ! गुरो शापान्मृतस्य च । तादृशे भोगायतनै विराग. कथमुच्यताम् ।१५। शिष्यशापादवशिष्यस्य देहावाप्तिमृतस्य च । श्रूयते किल मुक्ताना जन्म भक्तविमुक्तता ।१६। अतो भागवती माया दुर्बोध्याविजितात्मनाम् । विमोहयति ससारे नानात्वादिन्र्दजालवत् ।१७। इति तेषा वचो भूय' श्रुत्वा राजा शशिध्वज. प्रोवाच वदता श्रेष्ठो भक्तिप्रवणया धिया ।१८। बहूना जन्मनामन्ते तीर्थक्षेत्रादियोगत. दैवाद्वभवेत्साधुसगस्तस्मोदीश्वरदर्शनम् ।१६। ततः सालोक्यताम्प्राप्य भजन्त्याह्तचेतसः । भुंक्त्वा भौगांस्तपर्मोग्भक्तो भवति ससृतौ ।२०।

द्वादश अध्याय ] [ ४५१ रजोजुषः कर्मपरा, हरिपूजापराः सदा । तन्नामानि प्रगायन्ति तद्रूपस्मरणोत्सुकाः ॥२१॥ राजा बोले—हे भूपते ! गुरु वसिष्ठ के शापवश राजा निमि ने देह छोड़ा था । परन्तु आपके इस भोग्यय देह मे वैराग्य की उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? जब यज्ञान्त मे देवनाओ ने उनकी रक्षो करते हुए उस देह में प्रवेश करने की आज्ञा की, तब भी वे अपने छोडे हुए देह में प्रविष्ट होने मे सहमत न हुए, इसका क्या कारण था ? ॥१५॥ सुना जाता है कि शिष्य के शाप से गुरु वसिष्ठ ने देह त्याग कर पुनः देह को प्राप्त कर लिया। परन्तु, भक्त तो मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, तब वह उस विमुक्तता को छोड़ कर जन्म किन प्रकार धारण करे ? ॥१६। इस प्रकार भगवद् माया के वर्णन मे ज्ञानीजन भी अपने को असमर्थ पाते हैं । क्योकि वह माया इन्द्रजाल के समान समस्त लोक मे विस्तीर्ण होती हुई जीवो को विमोहित करती रहती है।१७। वक्ता श्रेष्ठ राजा शशिध्वज उनके वचन सुन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए बोले ।१८। उन्होने कहा—तीर्थ, क्षेत्रादि के योग को प्राप्त हुआ प्राणी जन्म जन्मान्तरो मे भगवत्कृपा से साधु सग को पाता है और उसी साधु सग के प्रभाव से उसे ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।१९। फिर वह सालोक्य पद को प्राप्त होकर हर्षित हृदय से हरि-भजन में तत्पर होता है। इस प्रकार भोग्य वस्तुओ का उपभोग करता हुआ वह मनुष्य लोक मे भक्त हो जाता है ।२०। रजोगुणी पुरुष अपने कर्म द्वारा सदा हरिपूजा-परायण रहते तथा उनके नाम और रूपादि का स्मरण करने मे सदा उत्सुक रहते हैं ।२१। अवतारानुकरापर्वव्रतमहोत्सवाः । भगवद्भक्तिपूजाढ्याः परमानन्दसम्प्लुताः ॥२२॥ अतो मोक्षं न वांञ्छन्ति दृष्टमुक्तिफलोदयाः । मुक्त्वाल्लभन्ते जन्मानि हरिभावप्रकाशकाः ॥२३॥

४५२ ] [ कल्कि पुराण हरिरूपाः क्षेत्रतीर्थपावना धर्मतत्परा । सारासारविद सेव्यसेवका द्वैतविग्रहाः ।२४। यथावतार कृष्णस्य तथा तत्सेविनामिह । एव निर्मेंनिमिषता लीला भक्तस्य लोचने ।२५। मुक्तस्यापि वषिष्ठस्य शरीरभजनादरः । एतद्व कथित भूपा माहात्म्य भक्तिभक्तयोः ।२६। सद्य पापहर पुंसा हरिभक्तिविवर्धनम् । सर्वेन्द्रियस्थदेवानामानन्दसुखसञ्चयम् । कामरागादिदोषघ्न मायामोहनिवारणम् ।२७। नानाशास्त्रपुराणवेदविमलव्याख्यामृताम्भोनिधि समथ्यातिचिर त्रिलोकमुनयो व्यासादयो भावुका । कृष्णे भावमननमेवममल हैयङ्गवन नव लब्ध्वा समृतिनाशन त्रिभुवने श्रीकृष्णतुल्यायते ।२८। वे श्रीहरि के अवतार का सदा अनुकरण करने वाले होते हैं । पर्वकाल मे व्रत, पूजन, भक्ति आदि मे तत्पर रहते हुए भी परमानन्द में लिप्त रहते हैं ।२२। वे सभी भक्तजन भोग फल को प्रत्यक्ष प्रकट होता देख कर मोक्ष की कामना नही करते और भोगो को भोगते हुए जन्म प्राप्त करके भी सदा हरिभाव को प्रकाशित करते रहते हैं ।२३। भक्त- जन हरिस্বরূপ और क्षेत्र तथा तीर्थों के पवित्र करने वाले, सार और असार के ज्ञाता, धर्मानुष्ठान मे तत्पर रहते हुए सेव्य-सेवक रूप मे निवास करते हैं ।२४। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार लेने के समान ही उनके सेवक भी समय-समय पर अवतार ग्रहण करते रहते हैं । इसी लिए तो निमि का भक्तो के नेत्रो पर निमेष रूप से निवास है, इसे भगवान की ही लीला समझना चाहिए ।२५। गुरु वसिष्ठ ने मुक्त होकर भी जो पुनः देह धारण किया, वह भी इसी कारण से किया था । हे राजाओ ! इस प्रकार भक्ति और भक्त का यह माहात्म्य मैंने आपके

द्वादश अध्याय ] [ ४५३ प्रति कहा है ।२६। इसके सुनने से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं, मन मे हरि-भक्ति की वृद्धि होती और इन्द्रियो के अधिष्ठाता देवता भी सुखी होते है । काम और रागादि सभी दोष तथा माया-मोह का नाश होता है ।२७। तीनो लोको के ज्ञाता मुनियो ने वेद पुराणादि शास्त्रो के अमृत रूपी सार का मजन करके यह अत्यन्त पवित्र एव मगल रूप श्रीकृष्ण भक्ति को प्राप्त किया है । यह भव-बन्धन को नष्ट करने वाली है । उन मुनियो को इस प्रकार का फल पाते देख कर उनको भगवान श्रीकृष्ण के समान ही माना गया है ।२८।