भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

४४४ ] [ कल्कि पुराण उनकी कृपा से मैंने उस सब प्रसग को सुना था। हे पापनाशन उप- स्थित सज्जनो ! जो बात मैंने सुनी थी। वही कहता हूँ, आप लोग सुनिये ।३०। का भक्ति संसृतिहरा हरौ लोकनमस्कृता । तामादौ वर्णय मुने नारदावहिता वयम् ।३१। मन षष्ठानीन्द्रियाणि संयम्य परया धिया । गुरावपि न्यसेद्देहं लोकतन्त्रविचक्षणः ।३२। गुरौ प्रसन्ने भगवान्प्रसीदति हरिः स्वयम् । प्रणवाग्निप्रियामध्ये मवरण तन्निदेशतः ।३३। स्मरेदनन्यया बुध्‍या देशिकं सुसमाहितः । पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः ।३४। पूजयित्वा वासुदेवपादपद्मं समाहितः । सर्वाङ्गसुन्दरं रम्यं स्मरेद्धृत्पद्ममध्यगम् ।३५। सनक ने कहा—हे मुने ! हे नारद ! किस प्रकार की हरि-भक्ति से जन्म नही लेना होता तथा कौन सी भक्ति प्रशसा के योग्य है। आप उसी को पहले कहिये। हम सुनने के इच्छुक हैं ।३१। नारद बोले— लोकतन्त्र के ज्ञाता साधक को श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा पांचो ज्ञानेन्द्रिय और छठवे मन का निग्रह करते हुए ज्ञाना-श्रय पूर्वक गुरु के चरणो मे अपना शरीर अर्पण कर देना चाहिये ।३२। क्योकि गुरु के प्रसन्न होने पर भगवान् श्रीहरि भी प्रसन्न होते हैं । प्रथम प्रणवाग्नि प्रिया के मध्य मे ॐ, का अनन्य हृदय से स्मरण करे । फिर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय आदि तथा स्नान और वस्त्राभूषणो से युक्त होकर सावधान चित्त से नारायण के चरणारविन्दो का पूजन करे । तदनन्तर हृत्पद्म के मध्य में प्रतिष्ठित सुरम्य और सर्वांग सुन्दर श्रीहरि के स्वरूप का चिन्तन करे ।३३-३५। एव ध्यात्वा वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियगणैः सह । आत्मानमर्पयेद्विद्वान्हरावेकान्तभाववित् ।३६।

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