भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

एकादश अध्याय ] ४४५ अङ्गानि देवास्तेषान्तु नामानि विदितान्युत । विष्णो कल्केरन्तस्य तान्येवान्यन्न विद्यते ।३७। सेव्य. कृष्ण सेवकोऽहमन्ये तस्यात्ममूर्त्त य । अविद्योपाधयो ज्ञानद्वदन्ति प्रभावदयः ।३८। भक्तस्यापि हरौ द्वैतं सेव्यसेवकवत्तदा । नान्याद्विना तमित्येव क्वच किञ्चन विद्यते ।३६। भक्त. स्मरति त विष्णु तन्नामानि च गायति । तत्कर्माणि करोत्येव तदानन्दसुखोदय ।४०। इस प्रकार ध्यान करने के पश्चात् वाणी, मन, बुद्धि ओर इन्द्रियो के सहित स्वयं को श्रीहरि मे समर्पित कर दे ।३६। भगवान् कलिक परमदेव एण अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु के अग हैं । जो सब नाम आपको विदित है, वह भगवान् श्रीहरि के अतिरिक्त और कुछ भी नही है ।३७। भगवान् श्री कृष्ण सेव्य और मैं उनका सेवक हूँ तथा ससार भर के सभी प्राणी उन्ही के मूर्त्त रूप हैं । ज्ञानियो का कहना है कि अविद्यारूपी उपाधि के वश मे पड कर ही यह सब उत्पन्न होते हैं ।३८। भक्तो के निमित्त सेव्य-सेवक भाव रूप द्वैत का आवि- र्भाव होता है। इस प्रकार श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नही है ।३६। उन्ही भगवान् विष्णु का भक्त सदा स्मरण करता, नाम-गुण कीर्त्तन करता तथा सभी कर्म उनके ही निमित्त किया करता है । इसी कारण उसके लिए आनन्द और सुख की उत्पत्ति होती है ।४०। नृत्यत्युद्धतवद्रौति हसति प्रैति तन्मन. । विलु ठत्यात्मविस्मृत्या न वेत्ति कियदन्तरम् ।४१। एवविधा भगवतो भक्तिरव्यभिचारिणी । पुनाति सहसा लोकान्सदेवासुरमानुषान् ।४२। भक्तिः सा प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मसम्पत्प्रकाशिता । शिवविष्णुब्रह्मरूपा वेदाद्याना वरापि वा ।४३। भक्ताः सत्वगुणाध्यासाद्रजसेन्द्रियलालसा. ।