कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० ] [ कल्कि-पुराण है। ८। इस प्रकार का आचरण न करना अधर्म है। उसका कोई प्राय- श्चित्त भी नही है। इसीलिए मै रणभूमि मे दुर्जय सेना के वध मे तत्पर होकर धर्म, सत्युग ओर कल्किजी को यहाँ ले आया। मेरे मत मे यही वास्तविक भक्ति है। इस विषय मे आपका अभिप्राय जो हो, वह बताइये ।६-१०। इसके अतिरिक्त मैं वेद-वाणी के अनुसार ही कहता हूँ कि भगवान् विष्णु सर्व-व्यापी हैं। यदि यह यथार्थ है तो फिर कौन किसी को मारता है और कौन मरता है ? ।११। जब मारने वाले विष्णु हैं, और मरने वाले भी विष्णु ही हैं, तो किसका वध हो सकता है ? फिर वेद की ही व्यवस्था है कि युद्ध आदि कर्मों मे जो वध होता है, वह वध नही माना जाता ।१२। यही बात चौदह मनुओ और मुनियो ने भी कही है। हम भी इसी के अनुसार यज्ञो और युद्धो के द्वारा भगवान् विष्णु का पूजन किया करते है। १३। इस प्रकार भगवती माया के आश्रय मे स्थित हुआ साधक विधिवत् सेव्य-सेवक भाव से भगवान् का यजन करके सुखी होता है, अन्य कोई विधि सुख-प्राप्त करने की नही है ।१४। निमेर्भू'पस्य भूपाल ! गुरो शापान्मृतस्य च । तादृशे भोगायतनै विराग. कथमुच्यताम् ।१५। शिष्यशापादवशिष्यस्य देहावाप्तिमृतस्य च । श्रूयते किल मुक्ताना जन्म भक्तविमुक्तता ।१६। अतो भागवती माया दुर्बोध्याविजितात्मनाम् । विमोहयति ससारे नानात्वादिन्र्दजालवत् ।१७। इति तेषा वचो भूय' श्रुत्वा राजा शशिध्वज. प्रोवाच वदता श्रेष्ठो भक्तिप्रवणया धिया ।१८। बहूना जन्मनामन्ते तीर्थक्षेत्रादियोगत. दैवाद्वभवेत्साधुसगस्तस्मोदीश्वरदर्शनम् ।१६। ततः सालोक्यताम्प्राप्य भजन्त्याह्तचेतसः । भुंक्त्वा भौगांस्तपर्मोग्भक्तो भवति ससृतौ ।२०।