कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ ] [ कल्कि पुराण चरणारविन्दो के पूजन किये बिना उनकी शोभा नही हो सकती ।६। हे जगद्रूप ! सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, मधुर वाणी से विभूषित, सुरम्य चेष्टा से युक्त आपका यह मुख यदि हमारा प्रिय नही करना चाहेगा तो हमारी तत्काल मृत्यु ही हो जायगी ।१०। हयचरभयहरकरहरशरणाखरतरवरदशबलमदन । जयहतपरभरभवरणनशनशशधरशतसमरसभरवदन ।।११।। इति तस्याः सुशान्ताया गीतेन परितोषित । उत्तस्थौ रणशय्याया. कलिर्युद्धस्थवीरवत् ।।१२।। सुशान्ता पुरतो दृष्ट्वा कृत वामे तु दक्षिणे । धर्मं शशिध्वज पश्चात्प्राहोऽति व्रीडितानन ।।१३।। का त्व पद्मपलाशाक्षि ! मम सेवार्थमुद्यता । कान्ते शशिध्वज. शूरो मम पश्चादुपस्थित ।।१४।। हे धर्म्म ! हे कृतयुग ! कथमत्रागता वयम् । रणाङ्गण विहायास्याः शत्रोरन्त पुरे वद ।।१५।। आप अश्वारोही सब को अभय देते हुए विचरते हैं ? आपके तीक्ष्ण बाणो के प्रहार से जो वीर पुरुष युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका आप ही प्रतिपालन करते हैं । आपके मुख मण्डल पर सैकडो चन्द्रमाओ की आभा चमकती है । शिव और ब्रह्मा भी सदा आपके आश्रय की याचना करते रहते हैं ।११। सुशान्ता द्वारा किये गये इस प्रकार के विनय-गान से सन्तुष्ट होकर कलिजी उसी प्रकार उठ पडे, जिस प्रकार रणक्षेत्र मे मूर्च्छित वीर उठ जाता है ।१२। उन्होने अपने सामने रानी शान्ता को, वाम पार्श्व मे सत्युग और दक्षिण पार्श्व मै धर्म को और अपने पीछे राजा शशिध्वज को खडे देखा तो लज्जा से मुख नीचा करके बोले ।१३। हे कमलपत्र जैसे नेत्र वाली ! तुम कौन हो और मेरी सेवा में क्यों तत्पर हुई हो ? यह बलवान् राजा शशिध्वज मेरे पीछे क्यो उपस्थित है ? ।१४। हे धर्म ! हे सत्युग ! हम युद्ध क्षेत्र