भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

४५२ ] [ कल्कि पुराण हरिरूपाः क्षेत्रतीर्थपावना धर्मतत्परा । सारासारविद सेव्यसेवका द्वैतविग्रहाः ।२४। यथावतार कृष्णस्य तथा तत्सेविनामिह । एव निर्मेंनिमिषता लीला भक्तस्य लोचने ।२५। मुक्तस्यापि वषिष्ठस्य शरीरभजनादरः । एतद्व कथित भूपा माहात्म्य भक्तिभक्तयोः ।२६। सद्य पापहर पुंसा हरिभक्तिविवर्धनम् । सर्वेन्द्रियस्थदेवानामानन्दसुखसञ्चयम् । कामरागादिदोषघ्न मायामोहनिवारणम् ।२७। नानाशास्त्रपुराणवेदविमलव्याख्यामृताम्भोनिधि समथ्यातिचिर त्रिलोकमुनयो व्यासादयो भावुका । कृष्णे भावमननमेवममल हैयङ्गवन नव लब्ध्वा समृतिनाशन त्रिभुवने श्रीकृष्णतुल्यायते ।२८। वे श्रीहरि के अवतार का सदा अनुकरण करने वाले होते हैं । पर्वकाल मे व्रत, पूजन, भक्ति आदि मे तत्पर रहते हुए भी परमानन्द में लिप्त रहते हैं ।२२। वे सभी भक्तजन भोग फल को प्रत्यक्ष प्रकट होता देख कर मोक्ष की कामना नही करते और भोगो को भोगते हुए जन्म प्राप्त करके भी सदा हरिभाव को प्रकाशित करते रहते हैं ।२३। भक्त- जन हरिस্বরূপ और क्षेत्र तथा तीर्थों के पवित्र करने वाले, सार और असार के ज्ञाता, धर्मानुष्ठान मे तत्पर रहते हुए सेव्य-सेवक रूप मे निवास करते हैं ।२४। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार लेने के समान ही उनके सेवक भी समय-समय पर अवतार ग्रहण करते रहते हैं । इसी लिए तो निमि का भक्तो के नेत्रो पर निमेष रूप से निवास है, इसे भगवान की ही लीला समझना चाहिए ।२५। गुरु वसिष्ठ ने मुक्त होकर भी जो पुनः देह धारण किया, वह भी इसी कारण से किया था । हे राजाओ ! इस प्रकार भक्ति और भक्त का यह माहात्म्य मैंने आपके