भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194

एकादश अध्याय ] [ ४४७ इत्येवद्भगवत ईश्वरस्य विष्णोगुंणकथन सनको विबुध्य भक्त्या सविनयवचनैः सुरर्षिवर्य परिणुत्वेन्द्रपुर जगाम शुद्ध ॥५१॥ भगवान् का शेष बचा हुआ उच्छिष्ट (प्रसाद) तथा इच्छित नैवेद्य ही पवित्र पथ्य स्वरूप है। भक्तो को इसी सात्विक आहार का भोजन करना चाहिये (अर्थात् भोज्य सामग्री भगवान् को अर्पण करके ही प्रसाद रूप मे सेवन करनी चाहिए) ।४६। जो भोजन इन्द्रियो को सन्तुष्ट करने वाला, वीर्य एव रक्त वर्द्धक तथा परमायु के देने वाला एव आरोग्यप्रद है, ऐसा शुद्ध भोजन राजसी कहा जाता है ।४७। कडुवा, खट्टा, जलन करने वाला, दुर्गन्ध युक्त तथा वासी भोजन तामसी मनुष्यो को प्रिय है ।४८। सतोगुणी पुरुष वन में निवास करते हैं, रजोगुणी मनुष्य ग्राम मे और तमोगुणी द्यूत खेलने के अथवा मद्य पीने के स्थान मे रहते हैं ।४९। भगवान् स्वय अपना हाथ उठा कर किसी को कुछ प्रदान नही करते, और न सेवक ही उनसे कुछ याचना करता है। फिर भी उनमे परस्पर सदा ही परम प्रीति रहती है, यह कैसी विचित्र बात है ? ।५०। पवित्र मन वाले सनक भक्तिपूर्वक नारदजी के द्वारा भगवान् विष्णु का गुण-कथन सुन कर विनम्र वचनो से देवर्षिवर नारदजी की स्तुति और नमस्कार कर देवलोक को चले गये ।५१।