कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश — द्वादश अध्याय एतद्वः कथित भूपा. कथनीयोरुकर्मरण । कथा भक्तस्य भक्तेश्च किमन्यत्कथयाम्यहम् ॥१॥ त्व राजन्वैष्णवश्रेष्ठः सर्वसत्वहिते रत । तवावेश. कथ युद्धरङ्गे हिंसादिकर्मणि ॥२॥ प्रायशः साधवो लोके जीवाना हितकारिण. । प्राणबुद्धिधनैर्वाग्भि. सर्वेषा विषयात्मनाम् ॥३॥ द्वैतप्रकाशिनी या तु प्रकृतिः कामरूपिणी सा सूते त्रिजगत्कृत्स्न वेदाश्च त्रिगुणात्मिका ॥४॥ ते वेदास्त्रिजगद्धर्मशासना धर्मनाशना । भक्तिप्रवर्तका लोके कामिना विषयेषिणाम् ॥५॥ वात्स्यायनादिमुनयो मनवो वेदपारगा । वहन्ति बलिमीशस्य वेदवाक्यानुशासिताः ॥६॥ वय तदनुगाः कर्म धर्म निष्ठा रणप्रियाः । जिघासन्त जिघासामो वेदार्थकृतनिश्चया. ॥७॥ राजा शशिध्वर्ज बोले--हे राजाग्रो ! जिनके असाधारण कर्म कीर्तन के योग्य हैं, उन भक्तो और भक्ति का महात्म्य मैंने कह दिया है । अब और क्या कहूँ ? ।१। राजा बोले--हे राजन् ! आप सब जीवो के कल्याण करने मे तत्पर तथा वैष्णव श्रेष्ठ हैं। फिर आप हिंसादि दोषो से युक्त युद्ध करने मे क्यो प्रवृत्त होगये थे ।२। प्राय; साधुजन