भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

तृतीयांश— एकादश अध्याय तत्राहूस्ते सभामध्ये वैष्णव त शशिध्वजम् । मुनिभि कथिताशेष-भक्तिव्यासक्तविग्रहम् ॥१॥ सुशान्ताञ्च कृतेनापि धर्मेण विधिद्युताम् । २॥ युंवा नारायणास्यास्य कल्केः श्वशुरता गतौ । वय नृपा इमे लोका ऋषयो ब्राह्मणाश्च ये ॥३॥ प्रेक्ष्य भक्तिवितान वा हरौ विस्मितमानसा. । पृच्छामस्त्वामिय भक्ति क्व लब्धा परमात्मनः ॥४॥ कस्य वा शिक्षिता राजन् ! किंवा नैसर्गिकी तव । श्रोतुमिच्छामहे राजन् ! त्रिजगज्जतपावतीम् । कथा भागवती त्वत्तः संसाराश्रमनाशिनीम् ॥५॥ सूतजी ने कहा—मुनियो के द्वारा अशेष कहे गए भक्तिमय देह वाले, विष्णु भक्त, धर्म और सत्युग के साथ स्थित एव रानी सुशान्ता के सहित शोभायमान् राजा शशिध्वज की ओर देखते हुए आगत राजा आदि व्यक्तियो ने कहा। १-२। राजागण बोले—अब आप साक्षात् नारायण के अवतार भगवान् कल्कि के श्वसुर-पद को प्राप्त हुए हैं। परन्तु हम सब राजागण, ऋषिगण और विप्रगण तथा अन्यान्य सभी उपस्थितजन आपकी भक्ति को ऐसे विस्तृत रूप मे देख कर अत्यन्त आश्चर्य को प्राप्त हुए हैं। हम आपसे यह पूछते है कि परमात्मा की ४३६