कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम-अध्याय ] ४३७ द्रष्टु समीयुस्त्वरिता हर्षात्सबलबाहनाः । शंखभेरी मृदङ्गाना वादित्राणाञ्च निस्वनैः ॥२६॥ नृत्यगीतविधानैश्च पुरस्त्रीकृतमङ्गलैः । विवाहो रमयाकल्केरभूदतिसुखावहः ।३०। उस अवसर पर मरु, देवापि, विशाखयूपनरेश और रुचिरारव आदि सभी कल्कि-पक्ष के राजागण शशिध्वज द्वारा आमन्त्रित किये गये । वे सब राजा शय्याकरण को साथ लेकर रणभूमि से भल्लाट नगरी मे आ पहुँचे । उस समय असंख्य कल्कि-सेना के पाँवो से वह नगरी मर्दित्ता हो गई। २६-२७। गज, अश्व, रथ, पदाति, छत्र और रथ की ध्वजाएँ आदि सभी से सुशोभित विवाह मण्डप मे कल्किजी और रमा का विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ ।२८। हर्ष से प्रफुल्लित हुए सभी व्यक्ति अपने दल बल और वाहनो के सहित उस उत्सव को देखने के लिए वहाँ आये । राजकुमारी रमा का विवाह शंख, भेरी, मृदंग आदि वाद्यो की सुमधुर ध्वनि और पुर-नारियो के श्रेष्ठ मङ्गलाचारो तथा नृत्य-गीतादि के सानन्द सम्पन्न हुआ । २६-३०। नृपा नानाविधैर्भोज्यै पूजिता विविशु सभाम् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चावरजातयः ॥३१॥ विचित्रभोगाभरणाः कल्कि द्रष्टुमुपाविशन् । तस्या सभाया शुशुभे कल्कि कममलोचनः ॥३२॥ नक्षत्रगणमध्यस्थ पूर्ण शशधरो यथा । रेजे राजगणाधीशो लोकान्सर्वाग्विमोहयन् ।६६। रमापति कल्किमवेक्ष्य भूप सभागत पद्मदलायतेक्षणम् । जामातर भक्तियुतेन कर्मणा विबुध्य मध्ये निषसाद तत्रह ।३४ विविध प्रकार भोज्य एव पान-पदार्थों से सत्कार प्राप्त करते हुए राजागण सभा मे प्रविष्ट हुए । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रीदि