कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश अध्याय ] [ ४४१ आवां गृहीत्वा गण्डक्याः शिलायां सलिलान्ति के । मस्तिष्कं चूर्णयामास लुब्धकः पिशिताशनः ॥१२॥ चक्राङ्कितशिलागङ्गामरणादपि तत्क्षणात् । ज्योतिर्मयविमानेन सद्यो भूत्वा चतुर्भुजौ ॥१३ प्राप्तौ वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनस्कृतम् । तत्र स्थित्वा युगशतं ब्रह्मणो लोकमागतौ ॥१४॥ ब्रह्मलोके पञ्चशतं युगानामुपभुज्य वै । देवलोके कालवशाद्गतं युगचतुःशतम् ॥१५॥ व्याध ने हम दोनो को अपने जाल मे बँधा हुआ देखा तो वह प्रसन्न होता हुआ शीघ्रता से हमारे पास आया और उसने हमारे कण्ठ पकड लिये । तब हम भी उस पर अपनी चोचो से आघात करने लगे ।११ तदनन्तर मांस के लोभी उस व्याध ने हम दोनो को पकड कर गण्डकी में स्थिति एक शिला पर पछाड-पछाड कर हमारे मस्तको को चूर्ण कर डाला ।१२। गङ्गा का किनारा और चक्राङ्कित शिला— मरण काल् मे इन दोनो क ।सान्निध्यता के प्रभाव से हम उसी समय चतुर्भुज रूप हो गये और तेजस्वी विमान मे चढ कर सब लोको के द्वारा नमस्कृत बैकुण्ठ लोक मे जा पहुँचे । वहाँ सौ युगो तक निवास करने के पश्चात् हमको ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुई ।१३-१४। उस ब्रह्मलोक मे पाँच सौ युगो तक सुख भोगने के पश्चात् काल के वश में पड कर देवलोक में गये और चार सौ युगों तक वहाँ सुख भोगते रहे ।१५। ततो भुवि नृपास्तावद्वद्धसूनुरहं स्मरन् । हरेनुगृहं लोकं शालग्रामशिलाश्रमम् ॥१६॥ जातिस्मरत्वं गण्डक्याः किं तस्याः कथयाम्यहम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण महात्म्यं महदद्भुतम् ॥१७॥ चक्रांकितशिलास्पर्शमरणस्येदृशं फलम् । न जाने वासुदेवस्य सेवया किं भविष्यति ॥१८॥ इत्यावाहहरिपूजासु सर्षविह्वलचेतसौ ।