कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६३ ) स्त्रियो वैधव्यहीनाश्च स्वच्छन्दाचरणप्रिया. ॥ ३४॥ चित्रवृष्टिकरा मेघा मन्दशस्या च मेदिनी । प्रजाभक्षा नृपा लोका. करपीडाप्रपीडिताः ॥ ३५ ॥ स्कन्धे भार करे पुत्रं कृत्वा क्षुब्धाः प्रजाजन. । गिरिदुर्गं वन घोरमाश्रयिष्यन्ति दुर्भगा. ॥ ३६ ॥ मधुमासैर्मूलफलैराहारै प्राण धारिण । एव तु प्रथमे पादे कले कृष्णविनिन्दका. ॥ ३७ ॥ पृथिवी अल्पशस्या होगयी, नदियाँ अन्यान्य स्थानो मे बहने वाली हुई, नारियाँ वेश्यालय मे सुख मानने लगीं और भार्याओं का पति मे अनुराग नही रहा ॥३३॥ पराये अन्न की कामना वाले ब्राह्मण शूद्रो के यहाँ यजन करने लगे, विधवाओ ने वैधव्य का आचरण त्याग दिया और स्वच्छन्द आचरणवाली होगई ॥३४॥ मेघ,खण्ड-वृष्टि वाले हुए, पृथिवी मन्दशस्या हुई, राजागण प्रजा-भक्षक होगये, जिससे प्रजा करों के भार से उत्पीडित हो उठी ॥ ३५ ॥ अत्यन्त क्षुब्ध हुए प्रजाजन कन्धे पर बोझओर हाथ में पुत्र लेकर दुर्गम पर्वत और घोर वनो में जाकर आश्रय खोजने लगे ॥ ३६ ॥ मधु,मास मूल और फल का भोजन ही प्राण धारणा का सहारा बन गया । कलि के प्रथम पाद मे ही मनुष्यगण श्री कृष्ण-निन्दक हो गये ॥ ३७ ॥ द्वितीये तन्नामहीनास्तृतीये वर्णसङ्कर. । एकवर्णाश्चतुर्थे च विस्मृत,च्युतसत्क्रियाः ॥ ३८ ॥ निःस्वाध्या-स्वधा-स्वाहा-वौषडोंकार-वर्जिता. । देवा सर्वे निराहारा. ब्रह्माण शरण ययु ॥ ३६ ॥ धरित्रीमग्रत कृत्वा क्षीणां दीनां मनस्विनीम् । ददृशुर्ब्रह्मणौ लोक वेदध्वनिनादितम् ॥ ४० ॥ यज्ञधूमै समाकीर्णं मुनिवर्यै निषेवितम् । सुवर्ण वेदिकामध्ये दक्षिणावर्त्त मुज्ज्वलम् ॥ ४१ ॥ र्वृत्ति यूपाइङ्कितोद्यान-वन-पुष्प-फलान्वितम् ।