भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

( २६४ ) सरोभिः सारसैर्हंसैराहूयन्त मिवातिथिम् ॥ ४२ कलि के द्वितीय पाद में लोग श्रीकृष्ण नाम को भी भूल गए, तीसरे पाद में वर्ण संकर उत्पन्न हुए और चौथे पाद में तो जाति-पाँति ही कुछ न रही, लोग सत्कर्म और ईश्वर को भी भूल गये ॥ ३८ ॥ स्वाध्याय, स्वधा, स्वाहा, वषट्कार और ओंकारादि का लोप हो गया जिससे सभी देवता आहार न मिलने के कारण पीड़ित होकर ब्रह्माजी की शरण में गये ॥ ३६ ॥ सभी क्षीणता को प्राप्त हुए दीन देवगण चिन्तित पृथ्वी को आगे करके ब्रह्म-लोक को गये । वह लोक उन्हें वेद-ध्वनि से गूँजता हुआ दिखाई दिया ॥ ४० ॥ वहाँ यज्ञ का धुआ फैल रहा था, मुनिगण उपासना एव यज्ञ कर रहे थे, स्वर्ण-वेदी के मध्य दक्षिणाग्नि प्रज्वलित थी, उद्यान वन-पुष्पों और फलो से परिपूर्ण थे, सरोवर में सारस और हंसों के मधुर स्वर ऐसे लग रहे थे, मानों अतिथियों का स्वागत कर रहे हों ॥ ४१-४२ ॥ वायु लोललताजालकुसुमालिकुलाकुलैः । प्रणताह्वान-सत्कार-मधुरालापवीक्षणै ॥ ४३ ॥ तद्ब्रह्मसदनं देवाः सेश्वराः क्लिन्नमानसाः । विविशुस्तदनुज्ञाता निजकार्य निवेदितुम् ॥ ४४ ॥ त्रिभुवनजक सदासनस्थ सनक-सनन्दन-सनातनेडवसिद्धैः परिसेवित पादकमल ब्रह्माण देवता नेमुः ॥ ४५ ॥ चंचल पवन लता-जालो को झकोर रहा था, अलि अवलि कलियों का रस-पान करते गूँज रहे थे, मानों यह सभी प्रणाम, आह्वान, सत्कार आदि के लिए मधुर वाणी का प्रयोग कर रहे हों ॥ ४३ ॥ अपने स्वामी इन्द्र के सहित खेद युक्त मन वाले सब देवता ब्रह्माजी की आज्ञा प्राप्त करके अपना दुःख निवेदन करने के लिए ब्रह्म-सदन में प्रविष्ट हुए ॥ ४४ ॥ वहाँ जाकर सनक, सनन्दन और सनातन से अपने चरण-कमलों की सेवा कराते हुए एवं श्रेष्ठ आसन पर आसीन ब्रह्मा- जी को उन देवताओं ने नमस्कार किया ॥ ४५ ॥