कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय उपविष्टास्ततो देवा ब्रह्मणो वचनात्पुरः । कलेर्दोषाद्धर्महानि कथयामासुरादरात् ॥ १ ॥ देवाना तद्वच श्रुत्वा ब्रह्मा तानाह दुःखितान् । प्रसादयित्वा तं विष्णु साधयिष्याम्यभीप्सितम् ॥ २ ॥ इति देवै परिवृत। गत्वा गोलोकवासिनम् । स्तुत्वा प्राह पुरो ब्रह्मा देवाना हृदयेप्सितम् ॥ ३ ॥ सूतजी बोले—हे मुनीश्वरो ! वहाँ जाकर वे सभी देवता ब्रह्माजी की आज्ञा से उनके समक्ष बैठ गये । फिर उन्होने कलि के दोषो से जो धर्म की हानि हुई थी, उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदन किया ।। १ ।। दुःखित हृदय वाले देवताओ के वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले—मै भगवान् विष्णु की आराधना करके तुम्हारा सब मनोरथ सिद्ध करता हूँ ॥२॥ यह कर ब्रह्माजी ने देवताओ को साथ लिया और गोलोक निवासी भगवान् श्री हरि की सेवा मे जा पहुँचे । वहाँ उन्होने स्तुति की और फिर देवताओ की कामना निवेदन की ॥३॥ तच्छ्रुत्वा पुण्डरीकाक्षो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ शम्भले विष्णुयशसो गृहे प्रादुर्भावाम्यहम् । सुमत्योमातरि विभो ! पत्न्यां त्वन्निदेशतः ॥ ४ ॥ चतुर्भिर्भ्रातृभिर्देव ! करिष्यामि कलिकक्षयम् । भवन्तो बान्धवा देवाः स्वांशेनावतरिष्यथ ॥ ५ ॥ इय मम प्रिया लक्ष्मी सिंहले संभविष्यति । बृहद्रथस्य भूपस्य कौमुद्या कमलेक्षणा । भार्यया मम भार्ये० ज्ञानाम्नी जनिष्यति ॥ ६ ॥