कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६१ ) ने द्यूत, मद्य, स्त्री और स्वर्ण मे निवास किया ॥१९॥ कलि की सगर्भा दुरुक्ति हुई । उन दोनो ने भयानक नामक पुत्र और मृत्यु नाम की कन्या उत्पन्न की । मृत्यु ने उसके द्वारा निरय नामक पुत्र को उत्पन्न किया ॥२०॥ निरय की सगर्भा यातना हुई । इन दोनो के सयोग से हजारो पुत्र उत्पन्न हुए । इस प्रकार कलि के कुल मे बहुतेरे धर्म-निन्दको की प्रतारणा हुई ॥२१॥ यह सभी आधि व्याधि बुढापा, ग्लानि दुख शोक और भय के आश्रय को प्राप्त होकर यज्ञ, अध्ययन, दानादि एव वैदिक तथा तांत्रिक कर्मों का नाश करने वाले हुए ॥२२॥ कलिराजानुगाश्चेरूर्यूथशो लोकनाशकाः । बभूवुः कालविभ्रष्टाः क्षणिकाः कामुका नराः ॥ २३ ॥ दम्भाचारदुराचारास्तातमातृविहिंसकाः । वेदहीना द्विजा दीनाः शूद्रसेवापराः सदा ॥ २४ ॥ कुतर्कवादबहुला धर्मविक्रयिणोऽधमाः । वेदविक्रयिणो व्रात्या रसविक्रयिणस्तथा ॥ २५ ॥ मांसविक्रयिणः क्रूराः शिश्नोदरपरायणाः । परदाररता मत्ता वर्णसङ्करकारकाः ॥ २६ ॥ ह्रस्वाकाराः पापसाराः शठा मठनिवासिनः । षोडशाब्दायुषः श्यालबान्धवा नीचसङ्गमा ॥ २७ ॥ लोकचरण का नाश करने वाले, कलिराज के अनुचर यूथों ने चंचल, क्षण-भंगुर और कामुक मनुष्य-देह धारण किये ॥२३॥ यह घोर दम्भी, दुराचारी, मातृ-पितृ-हिंसक अनुचरगण ब्राह्मण कुल मे जन्म लेकर भी वेद-विहीन, दरिद्री और शूद्रो के सेवा-परायण हुए ॥२४॥ कुतर्कवाद की बहुलता से युक्त, धर्म, वेद, रस, मांस आदि के विक्रय मे तत्पर, सस्कार-विहीन, शिश्नोदर-परायण, परदार-परायण, उन्मत्त एव वर्णशङ्कर सन्तानो के उत्पन्न करनेवाले हुए ॥२५-२६॥ यह नाटे आकार के, पापी, शठ, मठो मे निवास करने वाले, सोलह वर्ष की परम आयु वाले, यह कलि के सेवकगण साले को भाई के समान