भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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( २६० ) स मायाया भगिन्यान्तु लोभः पुत्रञ्च कन्यकाम् । निकृति जनयामास तयो क्रोध सुतोऽभवत् ॥ १७ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण के अपने लोक को पधारने के पश्चात् जिस प्रकार कलि की उत्पत्ति हुई, उस सब को कहता हूँ, आप लोग समाहित चित्त सुने ॥१३॥ जब प्रलयकाल व्यतीत हो गया तब ससार-स्रष्टा, लोक- पितामह ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया ॥१४॥ उसी पातक का नाम अधर्म हुआ, उस अधर्म के वंश का श्रवण, स्मरण एव रहस्य जानने से प्राणीमात्र सब पापो से मुक्त हो सकते है ॥१५॥ उस अधर्म की पत्नी बिल्ली जैसे नेत्र वाली, अत्यन्त रम्या हुई, जिसका नाम मिथ्या हुआ । फिर अधर्म के सयोग से अति तेजस्वी, महाक्रोधी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दभ था ॥१६॥ अधर्म और मिथ्या ने माया नाम की एक कन्या भी उत्पन्न की । दंभ और माया के सयोग से लोभ नामक पुत्र और निकृति नाम की कन्या हुई । लोभ और निकृति के सयोग से क्रोध नामक पुत्र हुआ ॥१७॥ सहिंसाया भगिन्यान्तु जनयामास त कलिम् । वामहस्त धृतोपस्थ तैलाभ्यक्ताञ्जनप्रभम् ॥ १८ ॥ काकोदर करालास्यं लोलजिह्वं भयानकम् । पूतिगन्ध द्यूतमद्यस्त्री सुवर्णकृताश्रयम् ॥ १६ ॥ भगिन्यान्तु दुरुक्त्या स भय पुत्रञ्च कन्यकाम् । मृत्यु स जनयामास तयोश्च निरयोऽभवत् ॥ २० ॥ यातनाया भगिन्यान्तु लेभे पुत्रायुतायुतम् । इत्थ कलिकुले जाता बहवो धर्मनिन्दका ॥ २१ ॥ यज्ञाध्ययनदानादिवेदतन्त्रविनाशका । आधिव्याधिजराग्नानिदुःखशोकभयाश्रया. ॥ २२ ॥ क्रोध की सयोनि हिंसा हुई । उन दोनो के सयोग से ससार को नष्ट वाले कलि की उत्पत्ति हुई । इस वाम कर मे उपस्थ धारण करने वाले कलि की देह कान्ति काजल के समान काली हुई ॥१८॥ काकोदर, कराल, चंचल जिह्वा वाले, भयानक दुर्गन्ध युक्त शरीरधारी इस कलि