कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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भ्रम से ही हमने अपने पुत्र को चार भुजा देखा था । फिर उस शम्भल ग्राम मे सभी पाप-ताप नष्ट होकर नित्य नवीन मगलाचार होने लगे ॥२२॥ भगवान् को पुत्र रूप मे प्राप्त करके पूर्णकामा सुमति ने ब्राह्मणो को एक सौ गौय दान की ॥२३। पवित्र हृदय वाले विष्णु- यशजी ने अपने पुत्र के मगल की कामना से ऋक्, यजु और सामवेदी ब्राह्मणो को नामकरण के लिए नियुक्त किया ॥२४॥ भगवान् के शिशु- रूप का दर्शन करने के लिए परशुराम, कृपाचार्य, वेदव्यास और द्रोणा- चार्यजी के पुत्र अश्वत्थामा भिक्षुक वेश मे वहाँ आये ॥२५॥ तानागतान्समालोक्य चतुरः सूर्यसन्निभान् । हृष्टरोमा द्विजवर पूजयाञ्चक्र ईश्वरान् ॥ २६ ॥ पूजितास्ते स्वासनेषु सविष्टा स्वसुखाश्रया । हरि क्रोडगत तस्य ददृशु सर्वमूर्त्तयः ॥ २७ ॥ तबालक नराकार विष्णु नत्वा मुनीश्वरा । कल्कि कल्कविनाशार्थमाविर्भूतं विदुर्बुधाः ॥ २८ ॥ नामाकुर्वस्ततस्तस्य कल्किरित्यभिविश्रुतम् । कृत्वा सस्कारकर्माणि ययुस्ते हृष्टमानसाः ॥ २६ ॥ तत स ववृधे तत्र सुमत्या परिपालित । कालेनाल्पेन कसारि शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ ३० ॥ सूर्य के समान तेजस्वी उन ईश्वर स्वरूप आगन्तुको को देखकर द्विजवर विष्णुयश ने उनका पूजन किया ॥२६॥ भले प्रकार सुपूजित हुए वे मुनिगण श्रेष्ठ आसनो पर सुखपूर्वक विराजे, तब उन्होने अपने पिता की गोद मे बैठे हुए भगवान के दर्शन किए ॥२७॥ उन ज्ञानी मुनीश्वरो ने मनुष्य रूप मे शिशु स्वरूप भगवान् को नमस्कार किया और तब उन्होने जान लिया कि कलिकाल के विनाशार्थ भगवान् श्री कल्कि का अवतार हुआ है ॥२८॥ फिर उनका सस्कार करते हुए उनका कल्कि नाम रखकर प्रसन्न मन से वे मुनीश्वर चले गये ॥२६॥ फिर कसारि भगवान् माता सुमति के द्वारा भले प्रकार लालित-पालित