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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

२७४ ] [ कल्कि पुराण साङ्गं चतुःषष्टिकलां धनुर्वेदादिकञ्च यत् । समधीत्य जामदग्न्यात्कल्किः प्राह कृताञ्जलिः ॥६॥ दक्षिणां प्रार्थय विभो ! या देया तव सन्निधौ । ययामे सर्वसिद्धिः स्याद्या स्यात्तव तोषकारिणी ॥७॥ ब्रह्मणा प्रार्थितो भूमन् ! कलिनिग्रहकारणात् । विष्णुः सर्व्वाश्रयः पूर्णः स जातः सम्भले भवान् ॥८॥ मत्तो विद्यां शिवाद्शस्त्रं लब्ध्वा वेदमयं शुकम् । सिंहले च प्रियां पद्मा धर्मान्संस्थापयिष्यसि । ६॥ जब भगवान् कल्कि चौंसठ कलाएं और सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर चुके तब उन्होंने हाथ जोड कर परशुराम से कहा- ।६। हे विभो ! जिस दक्षिणा के देने से मुझे सर्वसिद्धि की प्राप्ति होगी और जिस दक्षिणा की प्राप्ति से आप संतुष्ट हो सकेंगे, वह दक्षिणा मुझे बताने की कृपा करिये ।७। परशुराम बोले-- हे भूमन् ! कलिकाल का नाश करने के लिए ब्रह्माजी ने जिन भगवान् श्री हरि से निवेदन किया था, वे ही आप भगवान् विष्णु शम्भल ग्राम मे अवतरित हुए हैं ।८ और मुझसे विद्या, भगवान् शंकर से शस्त्र और वेदमय शुक तथा सिंहल देश से अपनी पत्नी पद्मा को प्राप्त करके भूमण्डल पर धर्म की स्थापना करेंगे ।६। ततो दिग्विजयेभूपान् धर्महीनान् कलिप्रियान् । निगृह्य बौद्धांन् देवापिं मरुञ्च स्थापयिष्यसि ।१०। वयमेतैस्तु संतुष्टाः साधुकृत्यैः सदक्षिणाः । यज्ञं दानं तपः कर्म करिष्यामो यथोचितम् ।११। इत्येतद्वचनं श्रुत्वा नमस्कृत्य मुनिं गुरुम् । बिल्वोदकेश्वरं देवं गत्वा तुष्टाव शंकरम् ।१२। पूजयित्वा यथान्याय शिवं शान्तं महेश्वरम् । प्रणिपत्याशुतोषं तं ध्यात्वा प्राह हृदिस्थितम् ।१३।

तृतीय अध्याय ] [ २७५ फिर दिग्विजय द्वारा धर्म-विहीन और कलिप्रिय राजाओ और बौद्धो का सहार कर मरु और देवापि को प्रतिष्ठित करोगे । तुम्हारा यह साधुकृत्य ही मुझको सतुष्ट करने वाली दक्षिणा होगी, क्योकि तब हम तप, यज्ञ, दान, ध्यान, आदि सभी कर्म भले प्रकार से कर सकेगे ।१०- ११। यह सुन कर और गुरुवर परशुरामजी को नमस्कार करके कल्कि भगवान् बिल्वोदकेश्वर महादेव के मन्दिर मे गये और उन्हे सन्तुष्ट करने लगे ।१२। हृदय मे स्थित उन आशुतोष शान्त स्वरूप शिवजी का उन्होने विधिवत् पूजन किया और प्रणाम तथा ध्यान के पश्चात् निवेदन किया ।१३। गौरीनाथ विश्वनाथ शरण्यंभूतावास वासुकीकण्ठभूषम् । त्र्यक्ष पञ्चास्यादिदेव पुराणं वन्दे सान्द्रनन्दसन्दोहदक्षम् । योगाधीश कामनाश कराल गङ्गासङ्गाक्लिन्नमूर्द्धानमीशम् । जटाजूटाटोपरिक्षिप्तभाव महाकाल चन्द्रभाल नमामि ॥ श्मशानस्थभूतबेतालसङ्ग नानाशस्त्रै. खड्गशूलादिभिश्च । व्यग्रात्युग्रा बाहवो लाकनाशे यस्य क्रोधोद्भूतलोकोऽनमेति । यो भूतादि पञ्चभूतंसिसृक्षु. तन्मात्रात्मा काल कर्मस्वभावे प्रहृत्येद् प्राप्य जीवत्वमीशो ब्रह्मानन्दो रमते त नमामि ॥ स्थितौ विष्णु सर्वजिष्णुः सुरात्मा लोकान् साधून् धर्ममेतून् बिभर्ति। ब्रह्माद्याशे योऽभिमानी गुणात्मा शब्दाद्यङ्गैस्तपरेश नमामि । यज्ञस्या वायवो वान्ति लोके ज्वलत्याग्नि सविता यातितप्यन् । शीताशु खेतारकैः सग्रहैश्च प्रवर्तते त परेश प्रपद्ये । यस्याश्वासात् सर्वधात्री धरित्री देवो वर्षत्यम्बु काल.- प्रमाता । मेरुमध्ये भुवनानाञ्च भर्त्ता तमीशानविश्वरूप नमामि ।१४-२०। कल्किजी ने कहा--हे गौरीपते ! हे विश्वेश्वर ! हे शरणागत- वत्सल ! हे सर्वभूताश्रय ! हे वासुकी नाग का कण्ठभूषण धारण करने

२७६ ] [ कल्किपुराण वाले प्रभो ! हे त्रिनेत्र ! हे पञ्चवदन ! हे पुराण पुरुष ! हे सघन आनन्द- दक्ष आदिदेव ! आपको नमस्कार है ।१४। हे योगाधीश्वर ! आप काम- देव का नाश करने वाले, कराल दशन, गगतरंग से समुज्ज्वल मूर्द्धा वाले, जटाजूट टोप युक्त, परिक्षिप्त भाव वाले महाकाल है । हे चन्द्रभाल ! आपको नमस्कार है ।१५। हे प्रभो ! आप भूत वेतालों के सहित श्मशान मे निवास करते हैं । आप अपनी भयानक भुजाओ मे विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र धारण करते हैं । प्रलय काल मे यह समस्त विश्व आपकी ही क्रोधानल मे भस्मीभूत हो जाता है ।१६। आप ही भूतादि तन्मात्रा रूप पञ्च भूत एव काल-कर्म-स्वभावानुसार सृष्टि रचना करते और अन्त मे प्रलय करके जीवत्व को प्राप्त होकर ब्रह्मानन्द मे रमण करते है, ऐसे आपको मेरा नमस्कार है ।१७। आप ही सुरात्मा विश्व के पालनार्थ विष्णु स्वरूप लेकर धर्म सेतु स्वरूप साधुओ की रक्षा करते हैं। आप ही शब्दादि अवयवो के द्वारा सगुण रूप ब्रह्माजी के अग रूप होते है। ऐसे आप परमेश्वर को नमस्कार है ।१८। आपकी आज्ञा से, वायु बहता, अग्नि प्रज्वलित होता, सूर्य प्रकाशित होता और तारागण के सहित चन्द्रमा उदित होता है । ऐसे आपको मैं शरण लेता हूँ ।१९। जिन की आज्ञा से पृथिवी विश्व को धारण किये है और मेघ समय पर वर्षा करते हैं तथा जो सब लोको क भरण करने वाले हैं, ऐसे आप ईशान एव विश्वरूप भगवान शकर को नमस्कार करता हूँ ।२०। इति कल्किस्तवं श्रुत्वा शिवः सर्वार्त्तिदर्शनः साक्षात् प्राह हसन्नीश. पार्वतीसहितोग्रत ।२१। कल्के. सम्स्पृश्य हस्तेन समस्तावयवं मुदा । तमाह वरय प्रेष्ठ ! वरं यत्तेऽभिकांक्षितम् ।२२। त्वया कृतमिद स्तोत्र ये पठन्ति जना भुवि । तेषां सर्वार्थसिद्धिः स्यादिह लोके परत्र च ।२३। विद्यार्थी चाप्नुयाद्विद्यां धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात् कामी पठनाच्छ्रवणादपि ।२४।

तृतीय अध्याय ] [ २७७ त्व गारुडमिद चाश्व कामग बहुरूपिणम् । शुकमेतञ्च सर्वज्ञ मया दत्त गृहाण भो ।२५। भगवान् कल्कि का स्तोत्र सुन कर सर्वात्मा भगवान् शङ्कर पार्वती सहित साक्षात् रूप मे प्रकट हुये-उन्होने आनन्दित होकर भगवान् कल्कि के देह पर कर स्पर्श करते हुए घोर मुसकराते हुए कहा-हे श्रेष्ठ ! अपना इच्छित वर मागो ।२१-२२। तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र का का भू-मण्डल मे जो भी कोई पाठ करेगा, उसकी इहलौ- किक और पारलौकिक सभी कामनाएँ पूर्ण होगी ।२३। इस स्तोत्र के पढने सुनने से विद्यार्थी को विद्या, धर्मार्थी को धर्म और अन्य कामना वाले को उसकी उसी कामना की प्राप्ति होती है ।२४। हे कल्कि ! मैं तुम्हे यह शीघ्रगामी, अनेक रूप धारी, गरुड़ अश्व युक्त सर्वज्ञ शुक प्रदान करता हूँ, इन्हे ग्रहण करो ।२५। सर्व शास्त्रास्त्रविद्वास सर्व वेदार्थपारगम् । जयिन सर्वभूताना त्वां वदिष्यन्ति मानवा ।२६। रत्नत्सरु करालञ्च करवालं महाप्रभम् । गृहाण गुरुभारायाः पृथिव्या भारसाधनम् ।२७। इति तद्वच आश्रुत्य नमस्कृत्य महेश्वरम् । शम्बलग्राममगमत् तुरगेण त्वरान्वितः ।२८। पितरं मातर भ्रातृन् नमस्कृत्य यथाविधि । सर्व तद्वर्णयामास जामदग्न्यस्य भाषितम् ।२६। शिवस्य वरदानञ्च कथयित्वा शुभा कथा । कल्किः परमतेजस्वी ज्ञातिभ्योऽथवदन्मुदा । हे कल्कि ! मनुष्यो मे तुम सर्व शास्त्रज्ञ, सर्व शस्त्रास्त्र विशारद, सर्व वेदो मे पारगामी एव सर्व भूतो मे विजयी कहे आओगे ।२६। यह रत्नत्सरु नामक महा कराल, अत्यन्त चमकती हुई, अत्यन्त भारी और पृथिवी के भार को सँभालने वाली तलवार ग्रहण

२७८ ] [ कल्किपुराण करो ।२७। भगवान् महेश्वर के वचन सुन कर कल्कि ने उन्हे प्रणाम किया और अश्व पर आरूढ होकर द्रुतगति से शभल ग्राम मे जा पहुंचे- ।२८। वहाँ पहुँच कर उन्होने अपने पिता, माता, भ्राता आदि को विधि- वत् नमस्कार कर परशुराम जी के कहे हुए सब वचन उन्हे सुनाये ।२६। फिर शिवजी द्वारा प्राप्त हुए वरदान की चर्चा की और अपने जाति वालो के मध्य स्थित होकर प्रसन्न हृदय से श्रेष्ठ कथा कहने लगे .३०। गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्यास्तच्छ्रुत्वा नन्दिता स्थिता. । कथोपकथन जात शम्भलग्रामवासिनाम् ।३१। विशाखयूपभूपाल श्रुत्वा तेषाञ्च भाषितम् । प्रादुर्भाव हरेर्मेने कलिनिग्रहकारकम् ।३२। माहिष्मत्या निजपुरे यागदानतपोव्रतान् । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रानपि हरे प्रियान् ।३३। स्वधर्मनिरतान् दृष्ट्वा धर्मिष्ठोऽभून्नृप. स्वयम् । प्रजापालः शुद्ध मनाः प्रादुर्भावात् श्रियः पतेः ।३४। अधर्मवश्यास्तान् दृष्ट्वा जनान् धर्मक्रियापरान् । लोभानृतादयो जग्मुस्तद्देशाद्दु खिता भयम् ।३५। उनके द्वारा वर्णित कथा सुन कर गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि अत्यन्त प्रसन्न हुए । कथा शभल ग्राम मे परस्पर कही जाती हुई अधिक प्रचारित हो गई ।३१। शभल ग्राम के लोगो से ही यह चर्चा विशाखयूपराज ने सुनी और उन्होने जान लिया कि भगवान् कल्कि ने कलि का निग्रह करने के लिए पृथिवी पर अवतार ले लिया है ।३२। उसकी माहिष्मती नगरी मे यज्ञ, दान, तपस्या और व्रतादि करने वाले सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भगवान के प्रीति पात्र हुए ।३३। रमापति भगवान् के अवतार लेने पर सभी वर्ण अपने-अपने धर्म मे तत्पर हुए तथा राजा भी प्रजापालक, पवित्र मन वाला, धार्मिक हुआ ।३४। उस नगरी के निवासियों को धर्म मे तत्पर देख कर लोभ,

तृतीय अध्याय ] [ २७६ असत्य और अधर्म के वशज भय से दुःखित होकर वहाँ से पलायन कर गये ।३५। जैत्रं तुरगमारुह्य खड्गञ्च विमलप्रभम् । दशितं, सशरं चापं गृहीत्वागात् पुराद्वहि ।३६। विशाखयूपभूपालः प्रायात् साधुजनप्रियः । कल्कि द्रष्टु हरेरंशाविर्भूतञ्च शम्भले ।३७। कवि प्राज्ञ सुमन्तञ्च पुरस्कृत्य महाप्रभुम् । गार्ग्य-भर्ग्य विशालैश्च ज्ञातिभि परिवारितम् ।३८। विशाखयूपो ददृशे चन्द्र तारागणैरिव । पुराद्बहि सुरैर्यद्वन्दिन्द्रमुच्चैःश्रव स्थितम् ।३६। विशाखयूपोऽवनतः सप्रहृष्टतनूरूहः । कल्केरालोकनात् सद्यः पूर्णात्मा वैष्णवोऽभवत् ।४०। भगवान् कल्कि तीक्ष्ण तलवार, धनुष और श्रेष्ठ बाणो को धारण कर शिव-प्रदत्त अश्व पर आरूढ होकर नगरी से बाहर चल दिये ।३६। सत जनो से स्नेह करने वाले विशाखयूप नरेश शभल ग्राम में अव- तरित भगवान् के दर्शनार्थ उपस्थित हुए ।३७। उस समय अत्यन्त प्रभाव वाले कवि प्राज्ञ, सुमन्त्र और गार्ग्य विशालादि से घिरे हुए तथा तारागण सहित चन्द्रमा और देवताओं सहित उच्चैःश्रवा के समान अश्व पर चढे कल्कि भगवान् को विशाखयूप नरेश ने नगर के बाहर निकलते देखा ।३८-३६। कल्कि भगवान को देखते ही रोमाञ्चित हुए राजा झुकते हुए पूर्ण वैष्णवत्व को प्राप्त होगया ।४०। सह राज्ञा वसन् कल्कि धर्मोनाह पुरोदितान् । ब्राह्मणाक्षत्रियविशामाश्रमाणां समासतः ।४१। ममाशान् कलिविभ्रष्टानिति मज्जन्मसङ्गतान् । राजसूयाश्वमेधाभ्यां मा यजस्व समाहितः ।४२। अयमेव परो लोको धर्मश्चाह सनातनः । कालस्वभावसस्काराः कर्मानुगतयो मम ।४३।

२८० ] [ कल्किपुराण सोमसूर्यकुले जातौ देवापिमरुसंज्ञकौ । स्थापयित्वा कृतयुगं कृत्वा यास्यामि सद्गतिम् ।४४। इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा कल्कि हरि प्रभुम् । प्रणम्य प्राह सद्धर्मान् वैष्णवान् मनसेप्सितान् ।४५। इति नृपवचन निशम्य कल्कि कलिकुलनाशनवासनावतार । निजजनपरिषद्विनोदकारीमधुरवचोभिराह साधुधर्मान् ।४६म। राजा से वार्तालाप करते हुए भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तथा आश्रमादि के धर्मों का सक्षिप्त रूप से वर्णन किया ।४१। कल्कि बोले – हमारे जो अंश कलि से प्राप्त पाप के द्वारा भ्रष्ट होगये थे, वे हमारे अवतरित होनेपर धर्म मार्ग पर आ गये हैं। हे राजन् ! तुम राजसूय या अश्वमेध यज्ञ करते हुए मेरी आराधना करो ।४२। मै ही परलोक हूँ, सनातन धर्म मे ही हूँ, काल, स्वभाव और सस्कार सभी मेरे कर्म के अनुगत रहते हैं ।४३। मैं चन्द्रवंश और सूर्यवंश मे क्रमश उत्पन्न देवापि और मरु नामक राजाओ को स्थापित करके तथा इस युग को सतयुग रूप करके सद्गति को प्राप्त हूँगा ।४४। यह सुनकर विशाखयूप नरेश ने भगवान कल्कि को प्रणाम किया और उनसे वैष्णव धर्म का प्रसग कहने का अनुरोध किया ।४५। राजा की कामना सुन कर कलिकुल का नाश करने की इच्छा से भूमण्डल पर अवतरित भगवान् कल्कि अपने परिजनो और अनुयायियो के हृदयो को आनन्दित करने वाली मिष्ठ वाणी से साधु धर्म की व्याख्या करने लगे .४६। — ❀ —

चतुर्थ-अध्याय 1 ततः कल्कि सभा मध्ये राजामानो रवियथा । बभाषे तं नृप धर्म-मयो धर्मान् द्विज प्रियान् ।१। कालेन ब्रह्मणो नाशे प्रलये मयि सङ्गताः । अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् कार्यमिदं मम ।२। प्रसुप्तलोकतन्त्रस्य द्वैतहीनस्य चात्मन । महानिशान्ते रन्तु मे समुद्भूतो विराट् प्रभुः ।३। सहस्रशीर्षा पुरुषा सहस्राक्षः सहस्रपात् । तदङ्गजोऽभवद्ब्रह्मा वेदवक्रो महाप्रभुः ।४। सूतजी बोले मुनीश्वरो ! उस समय सभा के मध्य मे भगवान् कल्कि सूर्य के समान विराजमान होकर विशङ्खयूप नरेश के प्रति धर्म- प्रसङ्ग कहने लगे ।१। कल्कि बोले—कालान्तर मे जब यह ब्रह्माण्ड नाश को प्राप्त होगा तब प्रलय होने पर मुझ मे विलोन हो जायगा । सृष्टि से पूर्व मैं ही विद्यमान था, अन्य कुछ भी नही था । इस सम्पूर्ण जगत् का कारण मैं ही हूँ ।२। सम्पूर्ण विश्व की प्रसुप्ति और द्वैतहीना- त्मिका महा रात्रि का अन्त होने पर मैं सर्वशक्ति सम्पन्न विराट्र्मूर्ति रूप मे आविर्भूत होता हूँ ।३। वह विराट्मूर्त्ति सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण वाली हुई, उसी मूर्ति के अङ्ग से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।४। जीवोपाधेर्ममांशाच्च प्रकृत्या मायया स्वया । ब्रह्मोपाधिः स सर्वज्ञो मम वाग्वेदशासितः ।। २८१

२८२ ] [ कल्किपुराण ससर्ज जीव जातानि कालमाया शयोगतः देवा मन्वादयो लोका स प्रजापतयः प्रभुः ॥६॥ गुणिन्‍या मायायाशा मे नानोपाधौ ससजरे । सोपाधय इमे लोका देवा सस्थाणुजङ्गमाः ॥७॥ ममांशा मायया सृष्टा यतो मय्याविशन् लये । एवविधा ब्राह्मणा ये मच्छरीरा मदात्मिकाः॥८॥ मामुद्धरन्ति भुवने यज्ञाध्ययनसत्क्रियाः । मां प्रसेवन्ति शसन्ति तपोदानक्रियास्विह ॥६॥ स्मरन्त्यामोदयन्त्येव नान्ये देवादयस्तथा । ब्राह्मणा वेदवक्तारो वेदा मे मूर्तयः पराः ॥१०॥ ब्रह्म उपाधि वाले सर्वज्ञपुरुष ने मेरी वेद वाणी के शासनानुसार मेरी माया प्रकृति की शक्ति, काल और अंश के सम्मिश्रण से इस जीवो- पधारी जाति को प्रकट किया । इस प्रकार मनु आदि प्रजापतियों के सहित देवता प्रकट हुए।५-६। मेरे अंश से त्रिगुणात्मिका माया अनेक प्रकार की उपाधि धारण करके इस लोक में देवता एव स्थावर जंगम सृष्टि प्रकट करती है ।७। माया सृष्टि का रचियता मेरा अंश अन्त मे मुझ में ही लय हो जाता है । इसी प्रकार ब्राह्मण मेरे ही आत्म स्वरूप एव देह हैं ।८। क्योकि ब्राह्मण यज्ञ वेदाध्ययन आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा मेरा उद्धार तथा तप दानादि द्वारा मेरी सेवा करते हैं ।६। वेदवक्ता ब्राह्मण जिस प्रकार स्मरण द्वारा मुझे प्रसन्न करते हैं, उस प्रकार देवतादि अन्य कोई भी मुझे प्रसन्न नहीं करते, क्योकि वेद ही मेरी परम मूर्ति है ।१०। तस्मादिमे ब्राह्मणाजास्तै पुष्टस्त्रिजगज्जनाः । जगन्तिमे शरीराणि तत्पोषे ब्रह्मणो वरः ॥११॥ तेनाहं तान्ममस्यामि शुद्धसत्वगुणाश्रयः। ततो जगन्मय पूर्वं मां सेवन्तेऽखिलाश्रयाः ॥१२॥

चौथा अध्याय ] [ २८३ विप्रस्य लक्षणं ब्रूहि त्वद्भक्तिं का च तत्कृता । यतस्तवानुग्रहेण वाग्बाणा ब्राह्मणा कृता ॥१३॥ वेदा मामीश्वरं प्राहुरव्यक्तं व्यक्तिमत्परम् । ते वेदा ब्राह्मणामुखे नानाधर्मे प्रकाशिताः ॥१४॥ यो धर्मो ब्राह्मणानां हि सा भक्तिर्मम पुष्कला । तयाहं तोषितः श्रीशः संभवामि युगे-युगे ॥१५॥ ब्राह्मण द्वारा वेदाध्ययन से तीनो लोको के निवासी पुष्टि को प्राप्त हो रहे हैं, प्राणी रूप मेरे देह को श्रेष्ठ ब्राह्मण ही पुष्ट करने हैं ॥११॥ इसलिए शुद्ध सत्वगुण का आश्रिन हुआ मैं ब्राह्मणो को मैं नमस्कार करता हूँ, तब ब्राह्मण भी मुझे विश्वमय समझ कर कर ही मेरी सेवा करते हैं ॥१२॥ विशाखयूप नरेश ने कहा-हे प्रभो ! आप मेरे प्रति ब्राह्मणों के लक्षण कहिये । वे आपकी भक्ति किस प्रकार करते हैं, जिस भक्ति को करके वे आपके अनुग्रह से वाग्बाण स्वरूप हो जाते हैं ॥१३॥ कल्कि बोले-हे राजन् ! अव्यक्त एव वेद ही मेरे ईश्वर हैं । ब्राह्मण के मुख मे यह वेद विभिन्न कर्मों का प्रकाश करते हैं ॥१४॥ ब्राह्मणों का धर्माचरण मेरे प्रति भक्ति रूप मे प्रकट है । उनकी उसी भक्ति से संतुष्ट होकर मैं युग-युग मे प्रकट होता हूँ ॥१५॥ ऊर्द्ध्वन्तु त्रिवृतं सूत्रं सधवार्निर्मितं शनैः । तन्तुत्रयमधोवृत्तं यज्ञ सूत्रं विदुर्बुधाः ॥१६॥ त्रिगुणं तद्ग्रन्थियुक्तं वेदप्रवरसंमितम् । शिरोधरात् नाभिमध्यात् पृष्ठाद्धं परिमाणकम् ॥१७॥ यजुर्विदां नाभिभितं सामगानामयं विधिः । वामस्कन्धेन विधृतं यज्ञ सूत्रं बलप्रदम् ॥१८॥ मृद्भस्मचन्दनाद्यैस्तु धारयेत् तिलक द्विजः । भाले त्रिपुण्ड्रं कर्माङ्गं केश पर्यन्तमुज्ज्वलम् ॥१६॥ पुण्ड्रमंगुलिमानन्तु त्रिपुण्ड्रं तत् त्रिधा कृतम् । ब्रह्मविष्णुशिवावासं दर्शनात् पापनाशनम् ॥२०॥

२८४ ] [ कल्किपुराण ज्ञानियों का कहना है कि ब्राह्मण की सधवा नारी के द्वारा सूत्र को त्रिवृत्त करे तथा उस त्रिवृत सूत्र को पुनः तिवृत करे यही यज्ञ सूत्र है। १६। वेद प्रवर युक्त उस सूत्र में गाँठ लगावे। यजुर्वेदी ब्राह्मण को यही यज्ञोपवीत कण्ठ से नाभि तक तथा पृष्ठ के आधे भाग तक धारण करे। सामवेदी ब्राह्मण को नाभि तक धारण करना चाहिए। यज्ञोपवीत बाँये कन्धे पर धारण करने से बल का देने वाला होता है- ।१७-१८। द्विज को मृत्तिका भस्म और चन्दनादि का तिलक लगाना चाहिये। मस्तक पर केश पर्यन्त उज्ज्वल त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये। १६। पुण्ड्र का प्रमाण एक अंगुल और त्रिपुण्ड्र इससे तिगुना होता है। त्रिपुण्ड्र में ब्रह्मा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। यह दर्शन करते ही पाप का नाश करने में समर्थ है। २०। ब्राह्मणाना करे स्वर्गा वाचो वेदा करे हरिः । गात्रे तीर्थानि रागश्च नाडीषु प्रकृतिस्त्रिवृत् ।२१ सावित्री कण्ठकुहरे हृदय ब्रह्म सहितम् । तेषा स्तनान्तरे धर्मं पृष्ठोऽधर्म. प्रकीर्तितः ।२२। भू देवा ब्राह्मणा राजन् ! पूज्या वन्द्या सदुक्तिभि । चतुराश्रम्यकुशला मम धर्म, प्रवर्त्तका. ।२३। बालाश्चापि ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा मम प्रियाः । तेषा वच पालयितुमवतारा कृता मयाः ।२४। महाभाग्य ब्राह्मणाना सर्वपापप्रणाशनम् । कलिदोषहर श्रुत्वा मुच्यते सर्वतो भयात् ।२५। ब्राह्मणों के हाथों में स्वर्ग और भगवान् विष्णु निवास करते हैं वाणी में वेद देह में तीर्थ और राग तथा नाडी में त्रिगुणात्मिका प्रकृति है। २१। ब्राह्मणों के कण्ठ में सावित्री, हृदय में ब्रह्म वक्षस्थल के मध्य में धर्म एवं पृष्ठ देश में अधर्म का निवास रहता है। २२। हे राजन् ! चारों आश्रमों के धर्म को जानने वाले, मेरे धर्म के प्रवर्त्तक—

कलिकपुराण ] [ २८५ देवता ब्राह्मण श्रेष्ठ वनशो के द्वारा वन्दनीय हैं ।२३। ज्ञानवृद्ध और ब्राह्मणो के बालको के प्रति मैं अत्यन्त प्रेम करता और उनके वचन पालनार्थ ही अवतार धारण करता हूँ ।२४। सभी पापो का नाशक, कलि काल के दोषो का हरण करने वाला ब्राह्मणो के महाभाग्य रूपी चरित्र को सुनने से सदा सब भय नष्ट हो जाते हैं ।२५। इति कलिकवचः श्रुत्वा कलिदोषविनाशनम् । प्रणम्य तं शुद्धमनाः प्रययौ वैष्णवाग्रणीः ।२६। गते राजानि सन्ध्यायां शिवदत्तशुको बुधः । चरित्वा कलिकनुगतः स्तुत्वा तं पुरतः स्थितः ६७। तं शुकं प्राह कलिकस्तु सस्मितं स्तुतिपाठकम् । स्वागतं भवता कस्मात् देशात् किं खादितं ततः ।२८। शृणु नाथ ! वचो मह्यं कौतूहलसमन्वितम् । अहं गंतश्च जलधेर्मध्ये सिंहल संज्ञके ।२६। यथा वृत्तं द्वीप गते तच्चित्रं श्रवणप्रियम् । बृहद्रथस्य नृपतेः कन्यायाश्चरितामृतम् ।३०। कलियुग के दोषो को नष्ट करने वाले भगवान् कलिक के वचन सुनकर पवित्र हृदय वैष्णव श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रणाम करके चला गया ।२६। राजा के चले जाने पर शिव प्रदत्त ज्ञानी शुक संध्या के समय भ्रमण से लौटकर भगवान् कलिक के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ । उनके स्तोत्र-पाठ को सुन कर कलिक भगवान् बोले—तुम किधर से आ रहे हो ? तुमने वहाँ क्या भोजन किया ? शुक बोला—हे नाथ ! आप मुझसे कौतुकमय वाणी सुनिये । मैं समुद्र के मध्य स्थित सिंहल द्वीप में गया था ।२६। उस द्वीप में घटित वृत्तान्त सुनने में बड़ा अच्छा है । राजा बृहद्रथ की कन्या का चरित्र अमृत के समान श्रेष्ठ है ।३०। कौमुद्यामिह जाताया जगतां पापनाशनम् । चरितं सिंहले द्वीपे चातुर्वर्ण्यजनावृते ।३१।

२८६ ] [ कल्किपुराण

प्रासाद-हर्म्य-सदन-पुर-राजि-विराजिते । रत्न-स्फटिक-कुडद्यादि-स्वलताभिभूषिते ।३२। स्त्रीभिरुत्तमवेशाभिः पद्मिनीभि समावृते । सरोभि सारसैहंसरुपकूलजलाकुले ।३३। भृङ्ग रङ्ग प्रसङ्गाढ्ये पद्म कल्हारकुन्दकैः । नानाम्बुजलताजाल-वनोपवन-मण्डिते ।३४। देशे बृहद्रथो राजा महाबलपराक्रमः । तस्य पद्मावती कन्या धन्या रेजे यशस्विनी ।३५।

इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका चरित्र श्रवण से पाप नाशक है । उस द्वीप मे चारो वर्ण के मनुष्यो का निवास है । ३१। भवन, अटारी, गृह युक्त नगर मे वहाँ का राजा सुशो- भित है । उसका भवन रत्न, स्फटिक, मणि तथा स्वर्ण आदि की पच्ची- कारी से विभूषित हो रहा है ।३२। वहाँ पद्मिनी प्रभृति स्त्रियाँ श्रेष्ठ वस्त्रादि से सुशोभित रहती हैं । सरोवरों मे सारस और हंस आदि पक्षी कलोल करते हैं । ।३३। वह द्वीप विभिन्न प्रकार की पद्मलताओ के जालो से सुशोभित है । उपवनो मे कल्हार, कुन्द आदि के पुष्पो पर भोरे गुंजार करते हैं ।३४। वहाँ का राजा बृहद्रथ महाबली और पराक्रमी है । उसकी पद्मावती नाम की कन्या भी अत्यन्त यशस्विनी है ।३५।

भुवने दुर्लभा लोकेऽप्रतिमा वरवर्णिनी । काम मोह करी चारु चरित्रा चित्र निर्मिता ।३६। शिव सेवापरा गौरी यथा पूज्या सुसम्मता । सखीभिः कन्यकाभिश्च जप ध्यान परायणा ।३७। ज्ञात्वा ताञ्च हरेर्लक्ष्मीं समुद्भूतां वराङ्गप्राम् । हरः प्रादुरभूत्साक्षात्पार्वत्या मह हर्षित ।३८। सा तमालोक्य वरदं शिव गौरी समन्वितम् । लज्जिताधोमुखी किञ्चन्नोवाच पुरतः स्थिता ।३६।

चतुर्थ अध्याय ] [ २८७ हरस्तामाह सुभगे ! तव नारायण पति । पाणि ग्रहीष्यति मुदा नान्यो योग्यो नृपात्मज ।४०। श्रेष्ठ मुख वाली,सुन्दर चरित्रमयी, कामदेव को भी मोहित करने वाली उस कन्या की समानता ससार मे कोई नही कर सकता ।३६। जिस प्रकार गिरिजा भगवान शकर की सेवा परायण है, उसी प्रकार पूज- नीया पद्मावती अपनी सखियो के साथ जप ध्यान-परायण रहती हैं । ।३७। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी को पद्मावती के रूप मे उत्पन्न हुई जानकर पार्वती जी के साथ भगवान शकर वहाँ पधारे ।३८। वरदाता शिवजी को पार्वती जी के सहित आये देख कर उस कन्या ने लज्जा से शिर नीचा कर लिया और अवाक् खडी रही ।३६। तब शिवजी बोले— हे सुभगे ! तुम्हारे पति भगवान नारायण ही तुम्हारा पाणि ग्रहण करेगे । क्योकि अन्य कोई राजकुमार तुम्हारे योग्य नही है ।४०। कामभावेन भुवने ये त्वा पश्यन्ति मानवा । तेनैव वयमा नार्यो भविष्यन्त्यपि तत्क्षणात् ।४१। देवासुरास्तथा नागा गन्धर्वाश्चारणादयः । त्वया रन्तु तथाकाले भविष्यन्ति किल स्त्रियः ।४२। विना नारायण देव त्वत्पाणिग्रहणार्थिनम् । गृह याहि तपस्त्यक्त्वा भाग्यस्तननुत्तमम् ।४३। मा क्षोभये हरेः पत्नि कमले विमल कुरु । इति दत्वा वर सोयस्तत्रैवान्तर्दधे हर ।४४। हरवरमिति सा निशम्य पद्मा समुचितमात्मनोरथ प्रकाशम् । विकसितवदना प्रणम्य सोम निजजन कालयभाविवेश रामा मृत्युलोक के वासी जो मनुष्य तुम्हारी ओर काम भाव से दृष्टि पात करेगे, वे तत्काल अपनी आयु के अनुकूल स्त्रीत्व भाव को प्राप्त हो जायेंगे ।४१। देवता, दैत्य, नाग, गधर्व चारण आदि मे भी जो कोई तुम पर कुदृष्टि डालेगे वे भी स्त्रीत्व को उसी समय प्राप्त होगे ।४२।

२८८ ] [ कल्कि पुराण भगवान नारायण के अतिरिक्त जो कोई भी तुम्हारा पाणिग्रहण करना चाहेगा, वह ऐसी ही दशा को प्राप्त होगा । अब तुम तपस्या को छोड़- कर भोग के योग्य अपना रूप बनालो और अपने घर को प्रस्थान करो ।४३। हे कमले ! तुम हरि की पत्नी हो, हर प्रकार का क्षोभ त्याग कर मन को स्वस्थ करो । इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी अन्तर्ध्यान होगये ।४४। भगवान शंकर से मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त करके प्रफुल्ल मुख हुई पद्मा शिवजी को प्रणाम करके अपने पितृ-गृह को गई ।४५। —❀— पंचम अध्याय गते बहुतिथे काले पद्मा वीक्ष्य बृहद्रथः । निरूढ यौवना पुत्री विस्मित पापशङ्कया ।१। कौमुदी प्राह महिषी पद्मोद्वाहेऽत्र क नृपम् । वरयिष्यामि सुभगे ! कुलशील समन्वितम् ।२। सा तमाह पति देवी शिवेन प्रतिभाषितम् । विष्णुरस्यः पतिरिति भविष्यति न सशय ।३। इति तस्यावच. श्रुत्वा राजा प्राह कदेतिताम् । विष्णुः सर्व गुहावासः पाणिमस्या ग्रहीस्यति ।४। न मे भाग्योदयः कश्चित् ये न जामातर हरिम् । वरयिष्यामि कन्यार्थे वेदवत्या मुनेर्यथा ।५। इमा स्वय वरा पद्मा पद्मामिव महोदधे । मथनेऽसुरदेवाना तथा विष्णुर्ग्रहीष्यति ।६। शुकदेव जी ने कहा — बहुत समय व्यतीत होने पर जब पुत्री को

पञ्चम अध्याय ] [ २८६ राजाबृहद्रथ ने उसे यौवनावस्था के लक्षणो से युक्त देखा तब वह पाप की शका से चिन्ता करने लगा ।१। तब राजा ने अपनी रानी कौमुदी के प्रति कहा कि हे सुभगे ! तुम मुझे परामर्श दो कि अपनी प्रिय पुत्री के विवा- हार्थ किस शीलगुण सम्पन्न एव श्रेष्ठ कुलोत्पन्न राजा को आमन्त्रित किया जाय ? ।२। यह सुन कर रानी कौमुदी ने राजा को भगवान् शकर के वचन स्मरण कराते हुए कहा कि इसके पति भगवान् श्री हरि ही होगे, इसमे सशय नही है ।३। उसके यह वचन सुनकर राजा बृहद्रथ ने रानी से पूछा कि हे प्रिये । यह तो बताओ कि भगवान् विष्णु कितने समय मे इसका पाणिग्रहण कर लेगे ।४। हे प्रिये ! अभी तो हमारा ऐसा भाग्योदय नही हुआ जन पडता कि जिससे प्रभाव से वेदवती के समान मैं भी स्वयवर मे भगवान् श्री हरि को अपने जामाता के रूप मे प्राप्त कर सकूँ ।५। देवताओ और दैत्यो के द्वारा मथन किये जाते समुद्र से उत्पन्न हुई पद्मासना पद्मा के समान मेरी इस पद्मा को स्वय- वर मे भगवान् श्री हरि वरण करलें ।६। इति भूपगणान्भूप समाहूय पुरस्कृतान् । गुणशीलवयोरूप विद्याद्रविण सवृतान् ।७। स्वयवरार्थं पद्मायाः सिंहले बहुमङ्गले । विचार्य कारयामास स्थान भूपनिवेशनम् ।८। तत्रायाता नृपाः सर्व विवाह कृत निश्चयाः । निज सैन्यैः परिवृता, स्वर्णांरत्न विभूषिता ।६। रथान्गजानश्ववरान्समारूढा महाबला. । श्वेतच्छत्रकृतच्छायाः श्वेतचामर वीजिताः ।१०। शस्त्रास्त्रतेजसा दीप्ता देवा सेन्द्राइवाभवन । रुचिराश्वः सुकर्मा च मदिराक्षो दृढाशुगः ।११। कृष्णसारः पारदश्च जीमूतः क्रूरमर्दन । काश कुशाम्बुर्वसुमान् कङ्कः क्रथन सञ्जयौ ।१२। गुरुमित्रः प्रमार्थी च विजृम्भ सञ्जयोक्षम ।

२६० ] [ कल्कि पुराण एते चान्ये च बहवः समायाता महाबलाः ।१३। ऐसा सोचते हुए राजा वृहद्रथ ने, अपनी कन्या के स्वयवर के निमित्त गुणवान, शीलवान, रूपवान, विज्ञ एव महान् ऐश्वर्य वाले युवावस्था से परिपूर्ण राजाओ को सम्मान सहित आमन्त्रित किया ।७। इस प्रकार उस सिंहल देश मे पद्मा के स्वयवर का उत्सव मनाया जाने लगा बहुत प्रकार के मगल होने लगे और राजाओ के निवास आदि के लिए स्थान सज्जित किये जाने लगे ।८। विवाह की इच्छा से सुवर्ण, मणि- रत्नादि से विभूषित हुए राजागण देश विदेश से अपनी सेनाओ के सहित वहाँ आने लगे ।६। वे सभी बलवान् राजागण रथ, अश्व, गज आदि विभिन्न वाहनो पर सवार होकर वहाँ आये। उनके ऊपर श्वेत छत्र लगाये और चमर डुलाये जाते थे । १०। उस समय शस्त्रादि से दैदीप्यमान वे सब राजागण ऐसे शोभा पाने लगे जैसे देवताओ के समाज मे इन्दु सुशोभित होते हैं। रुचिराश्व, सुकर्मा, मदिराक्ष, दृढाशुग, कृष्ण- सार, पारद, जीमूत क्रूरमर्दन, शश, कुशाम्बु, वसुमान, कक, क्रथन, सजय, गुरुमित्र, प्रमाथी, विजृम्भ सञ्जय, अक्षम आदि अनेक महा- पराक्रमी नरेशगण वहाँ एकत्र होगये ।११-१३। विविशुस्ते रङ्गगता स्वस्वस्थानेषु पूजिता. । वाद्यताण्डवसन्हृष्टाश्चित्र माल्यम्बराधराः ।१४। नानाभोगसुखोद्रिक्ता कामरामा रतिप्रदा. । तानालोक्य सिंहलेश स्वा कन्या वरवर्णिनीम् ।१५। गौरी चन्द्रनना श्यामा तारहारविभूषिताम् । मणिमुक्ताप्रवालैश्च सर्वाङ्गालकृतां शुभाम् ।१६। कि माया मोहजननी कि वा कामप्रियां भुवि । रूपलावण्यसम्पन्न्या न चान्यमिह दृष्टवान ।१७। स्वर्गे क्षितौ वा पातालेऽप्यह सर्वत्रगो यदि । पश्चद्वासीगणाकीर्णां सखीभिः परिवारिताम् ।१८।

पंचम अध्याय ] [ २६१ वे राजागण विविध प्रकार के वस्त्राभूषण, माला आदि से विभूषित होकर रगभूमि मे आकर सादर सम्मानित होते हुए सुखपूर्वक अपने-२ अपने स्थान पर बैठ गये ।१४। विभिन्न प्रकार के भोगो और ऐश्वर्य से सम्पन्न, रमणीय, चरित्र वाले एव सब को प्रसन्न करने के स्वभाव वाले राजाओ को देखकर सिंहलेश बृहद्रथ ने अपनी वरवर्णिनी कन्या को स्वयवर मे बुलाया ।१५। गौरी, चन्द्रानना, श्यामा मणि-मोती रत्नो आदि से सब प्रकार विभूषित, अत्यन्त सुन्दर हार को धारण किये हुए वह पद्मावती मोहमयी माया अथवा कामदेव की साक्षात् पत्नी ही अव- तरित हुई प्रतीत होने लगी । मैं स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल सभी लोको मे तो गमन करता हूँ । परन्तु ऐसी रूप लावण्य वाली कोई अन्य कन्या मैंने कही भी नही देखी । उस कन्या के पीछे दासियां चल रही थी तथा उसके चारो ओर सखियां थी ।१६-१८। दौवारिकैर्वेत्रहस्तै शासितान्तः पुराद्बहिः । पुरोबन्दिगणाकीर्णा प्रापयामास ता शनैः ।१९। नूपुरैः किङ्किणीमिश्र क्वणन्ती जनमोहिनीम् । स्वागताना नृपाणाञ्च कुल शील गुणान्बहून ।२०। शृण्वन्ती हसगमना रत्नमालाकरग्रहा । रुचिरापाङ्गभङ्गेन प्रेक्षन्ती लोलकुण्डला ।२१। नृत्यत्कुन्तलसोपान गण्ड मण्डल मडिता । किञ्चित्स्मेरोल्लसद्द्रकदशनद्योतदीपिता ।२२। वेदीमध्यारुणा क्षौमवसना कोकिलस्वना । रूप लावण्य पण्येन क्रतुकामा जगत्त्रयम् ।२३। समागता तां प्रसमीक्ष्य भूपाः समोहिनी काम विमूढ चित्ताः । पेतुः क्षितौ विस्मृतवस्त्रशस्त्रा रथाश्वमत्तद्विपवाहनास्ते ।२४। नगर के बाहर दौवारिकगण हाथो मे बेत लिए हुए अन्त पुर के शासन मे सलग्न थे । सभास्थल के अगले भाग मे बंदीगण खडे थे । उस रग भूमि मे राजकुमारी पद्मा मदगति से प्रविष्ट हुई ।१९। नूपुर और

२६२ ] [ कल्कि पुराण किङ्किणी से लोको को मोहने वाली झंकार करती हुई और आगत नरेशो के कुल, गुण, शील आदि का वर्णन श्रवण करती हुई वह हंसगति वाली राजकन्या हाथ मे रत्नमाला लिए हुए अपने चंचल अंगो से शोभा को पाती हुई और कटाक्षपूर्वक सब को देखती हुई बढ़ती जा रही थी । वह हिलते हुए कुण्डल वाली, केशकुन्तल की चंचलता से युक्त, सुन्दर ग्रीवा वाली, विकसित मुख से मद मुमकराती हुई, जिसके दांतो की पक्तियाँ चमक रही थी, लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए, कोकिला जैसे कण्ठ स्वर वाली, जिसके रूप लावण्य से तीनो लोक मोहित हो रहे थे, उस मनमोहिनी सुकुमारी राज कन्या को रंगभूमि मे घूमती हुई देख- कर कामदेव के वशीभूत हुए राजागण ऐसे विह्वल चित्त होगये कि उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्रादि सभी खुल-खुल कर पृथिवी पर गिरने लगे ।१६-२४। तस्याः स्मरक्षोभ निरीक्षणेन स्त्रियो बभूवुः कमनीयरूपाः । बृहन्नितम्बस्तनभारनम्रा सुमध्यमास्तत्स्मृतिजातरूपा. ।२५। विलासहास व्यसनातिचित्राः कान्तानन. शोणसरोज नेत्राः । स्त्रीरूपमात्मानमवेक्ष्य भूपास्तामन्वगच्छन्विशदानुवृत्त्या ।२६। अह वटस्थः परहर्षितात्मा पद्माविवाहोत्सवदर्शनाकुल. । तस्या वचोऽन्तर्हृदि दुःखितायाः श्रोतु स्थित. स्त्रीत्वमितेषु तेषु । जाहीहि कल्के कमलाविलाप श्रुत विचित्रं जगतामधीश । गते विवाहोत्सवमङ्गले सा शिव शरण्य हृदये निधाय ।२८। तान्दृष्ट्वा नृपती.गजाश्वरथिभिरत्यक्तान्सखित्व गतान् । स्त्रीभावेन समन्विताननुगतानपद्मा विलोक्यान्तिके । दीना त्यक्तविभूषणा विलिखती पादागुलै. कामिनी ॥ ईशं कर्तुं निजनाथमीश्वरवचस्तथ्य हरिसाऽस्मरत् ।२६। काम से विमोहित हुए उन राजाओ ने जैसेही उस राजकन्या को वासनामय नेत्रो से देखा वैसे ही वे जिस रूप पर लालायित हुए थे, वैसे

पचम अध्याय ] [ २६३ ही रूप वाली कमनीय नारी का रूप उन्हे प्राप्त होगया ।२५। इस प्रकार नारी सुलभ हास, विलास, व्यसन, चातुर्य, सुन्दर मुख और कमल जैसे नेत्रो को प्राप्त हुए वे राजागण अपने को स्त्री हुए देख कर पद्मा के पीछे पीछे उसकी सहेली बनकर चलने लगे ।२६। उस समय पद्मा के विवाह का वह उत्सव देखने के निमित्त मैं पास ही के एक वृक्ष पर बैठ गया था । जब वे राजागण स्त्री रूप हो गये, तब तो पद्मा अत्यन्त शोकित ही उठी । मैं उसके विलाप को सुनता रहा । हे लोक स्वामिन् ! उस मगलमय उत्सव के इस प्रकार समाप्त हो जाने पर पद्मा ने भगवान् शकर का ध्यान कर जो विलाप किया था, उस करुण विलाप को आप श्रवण कीजिये । पद्मा ने देखा कि सभी राजागण मुझे देखते ही अपने हाथी, अश्व, रथ आदि से विलग होकर स्त्री रूप मे मेरी सहेली होकर साथ-साथ चल रहे हैं, तो वह अत्यन्त दीनतापूर्वक अपने आभूषणो को त्याग कर धरती को कुरेदने लगी । फिर वह शिवजी के वर- दान की सफलता के हेतु भगवान् विष्णु का पति भाव से ध्यान करने लगी ।२७-२६।