कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम अध्याय ] [ २८६ राजाबृहद्रथ ने उसे यौवनावस्था के लक्षणो से युक्त देखा तब वह पाप की शका से चिन्ता करने लगा ।१। तब राजा ने अपनी रानी कौमुदी के प्रति कहा कि हे सुभगे ! तुम मुझे परामर्श दो कि अपनी प्रिय पुत्री के विवा- हार्थ किस शीलगुण सम्पन्न एव श्रेष्ठ कुलोत्पन्न राजा को आमन्त्रित किया जाय ? ।२। यह सुन कर रानी कौमुदी ने राजा को भगवान् शकर के वचन स्मरण कराते हुए कहा कि इसके पति भगवान् श्री हरि ही होगे, इसमे सशय नही है ।३। उसके यह वचन सुनकर राजा बृहद्रथ ने रानी से पूछा कि हे प्रिये । यह तो बताओ कि भगवान् विष्णु कितने समय मे इसका पाणिग्रहण कर लेगे ।४। हे प्रिये ! अभी तो हमारा ऐसा भाग्योदय नही हुआ जन पडता कि जिससे प्रभाव से वेदवती के समान मैं भी स्वयवर मे भगवान् श्री हरि को अपने जामाता के रूप मे प्राप्त कर सकूँ ।५। देवताओ और दैत्यो के द्वारा मथन किये जाते समुद्र से उत्पन्न हुई पद्मासना पद्मा के समान मेरी इस पद्मा को स्वय- वर मे भगवान् श्री हरि वरण करलें ।६। इति भूपगणान्भूप समाहूय पुरस्कृतान् । गुणशीलवयोरूप विद्याद्रविण सवृतान् ।७। स्वयवरार्थं पद्मायाः सिंहले बहुमङ्गले । विचार्य कारयामास स्थान भूपनिवेशनम् ।८। तत्रायाता नृपाः सर्व विवाह कृत निश्चयाः । निज सैन्यैः परिवृता, स्वर्णांरत्न विभूषिता ।६। रथान्गजानश्ववरान्समारूढा महाबला. । श्वेतच्छत्रकृतच्छायाः श्वेतचामर वीजिताः ।१०। शस्त्रास्त्रतेजसा दीप्ता देवा सेन्द्राइवाभवन । रुचिराश्वः सुकर्मा च मदिराक्षो दृढाशुगः ।११। कृष्णसारः पारदश्च जीमूतः क्रूरमर्दन । काश कुशाम्बुर्वसुमान् कङ्कः क्रथन सञ्जयौ ।१२। गुरुमित्रः प्रमार्थी च विजृम्भ सञ्जयोक्षम ।