भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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२८८ ] [ कल्कि पुराण भगवान नारायण के अतिरिक्त जो कोई भी तुम्हारा पाणिग्रहण करना चाहेगा, वह ऐसी ही दशा को प्राप्त होगा । अब तुम तपस्या को छोड़- कर भोग के योग्य अपना रूप बनालो और अपने घर को प्रस्थान करो ।४३। हे कमले ! तुम हरि की पत्नी हो, हर प्रकार का क्षोभ त्याग कर मन को स्वस्थ करो । इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी अन्तर्ध्यान होगये ।४४। भगवान शंकर से मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त करके प्रफुल्ल मुख हुई पद्मा शिवजी को प्रणाम करके अपने पितृ-गृह को गई ।४५। —❀— पंचम अध्याय गते बहुतिथे काले पद्मा वीक्ष्य बृहद्रथः । निरूढ यौवना पुत्री विस्मित पापशङ्कया ।१। कौमुदी प्राह महिषी पद्मोद्वाहेऽत्र क नृपम् । वरयिष्यामि सुभगे ! कुलशील समन्वितम् ।२। सा तमाह पति देवी शिवेन प्रतिभाषितम् । विष्णुरस्यः पतिरिति भविष्यति न सशय ।३। इति तस्यावच. श्रुत्वा राजा प्राह कदेतिताम् । विष्णुः सर्व गुहावासः पाणिमस्या ग्रहीस्यति ।४। न मे भाग्योदयः कश्चित् ये न जामातर हरिम् । वरयिष्यामि कन्यार्थे वेदवत्या मुनेर्यथा ।५। इमा स्वय वरा पद्मा पद्मामिव महोदधे । मथनेऽसुरदेवाना तथा विष्णुर्ग्रहीष्यति ।६। शुकदेव जी ने कहा — बहुत समय व्यतीत होने पर जब पुत्री को