कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय ] [ २८७ हरस्तामाह सुभगे ! तव नारायण पति । पाणि ग्रहीष्यति मुदा नान्यो योग्यो नृपात्मज ।४०। श्रेष्ठ मुख वाली,सुन्दर चरित्रमयी, कामदेव को भी मोहित करने वाली उस कन्या की समानता ससार मे कोई नही कर सकता ।३६। जिस प्रकार गिरिजा भगवान शकर की सेवा परायण है, उसी प्रकार पूज- नीया पद्मावती अपनी सखियो के साथ जप ध्यान-परायण रहती हैं । ।३७। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी को पद्मावती के रूप मे उत्पन्न हुई जानकर पार्वती जी के साथ भगवान शकर वहाँ पधारे ।३८। वरदाता शिवजी को पार्वती जी के सहित आये देख कर उस कन्या ने लज्जा से शिर नीचा कर लिया और अवाक् खडी रही ।३६। तब शिवजी बोले— हे सुभगे ! तुम्हारे पति भगवान नारायण ही तुम्हारा पाणि ग्रहण करेगे । क्योकि अन्य कोई राजकुमार तुम्हारे योग्य नही है ।४०। कामभावेन भुवने ये त्वा पश्यन्ति मानवा । तेनैव वयमा नार्यो भविष्यन्त्यपि तत्क्षणात् ।४१। देवासुरास्तथा नागा गन्धर्वाश्चारणादयः । त्वया रन्तु तथाकाले भविष्यन्ति किल स्त्रियः ।४२। विना नारायण देव त्वत्पाणिग्रहणार्थिनम् । गृह याहि तपस्त्यक्त्वा भाग्यस्तननुत्तमम् ।४३। मा क्षोभये हरेः पत्नि कमले विमल कुरु । इति दत्वा वर सोयस्तत्रैवान्तर्दधे हर ।४४। हरवरमिति सा निशम्य पद्मा समुचितमात्मनोरथ प्रकाशम् । विकसितवदना प्रणम्य सोम निजजन कालयभाविवेश रामा मृत्युलोक के वासी जो मनुष्य तुम्हारी ओर काम भाव से दृष्टि पात करेगे, वे तत्काल अपनी आयु के अनुकूल स्त्रीत्व भाव को प्राप्त हो जायेंगे ।४१। देवता, दैत्य, नाग, गधर्व चारण आदि मे भी जो कोई तुम पर कुदृष्टि डालेगे वे भी स्त्रीत्व को उसी समय प्राप्त होगे ।४२।