भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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२७८ ] [ कल्किपुराण करो ।२७। भगवान् महेश्वर के वचन सुन कर कल्कि ने उन्हे प्रणाम किया और अश्व पर आरूढ होकर द्रुतगति से शभल ग्राम मे जा पहुंचे- ।२८। वहाँ पहुँच कर उन्होने अपने पिता, माता, भ्राता आदि को विधि- वत् नमस्कार कर परशुराम जी के कहे हुए सब वचन उन्हे सुनाये ।२६। फिर शिवजी द्वारा प्राप्त हुए वरदान की चर्चा की और अपने जाति वालो के मध्य स्थित होकर प्रसन्न हृदय से श्रेष्ठ कथा कहने लगे .३०। गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्यास्तच्छ्रुत्वा नन्दिता स्थिता. । कथोपकथन जात शम्भलग्रामवासिनाम् ।३१। विशाखयूपभूपाल श्रुत्वा तेषाञ्च भाषितम् । प्रादुर्भाव हरेर्मेने कलिनिग्रहकारकम् ।३२। माहिष्मत्या निजपुरे यागदानतपोव्रतान् । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रानपि हरे प्रियान् ।३३। स्वधर्मनिरतान् दृष्ट्वा धर्मिष्ठोऽभून्नृप. स्वयम् । प्रजापालः शुद्ध मनाः प्रादुर्भावात् श्रियः पतेः ।३४। अधर्मवश्यास्तान् दृष्ट्वा जनान् धर्मक्रियापरान् । लोभानृतादयो जग्मुस्तद्देशाद्दु खिता भयम् ।३५। उनके द्वारा वर्णित कथा सुन कर गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि अत्यन्त प्रसन्न हुए । कथा शभल ग्राम मे परस्पर कही जाती हुई अधिक प्रचारित हो गई ।३१। शभल ग्राम के लोगो से ही यह चर्चा विशाखयूपराज ने सुनी और उन्होने जान लिया कि भगवान् कल्कि ने कलि का निग्रह करने के लिए पृथिवी पर अवतार ले लिया है ।३२। उसकी माहिष्मती नगरी मे यज्ञ, दान, तपस्या और व्रतादि करने वाले सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भगवान के प्रीति पात्र हुए ।३३। रमापति भगवान् के अवतार लेने पर सभी वर्ण अपने-अपने धर्म मे तत्पर हुए तथा राजा भी प्रजापालक, पवित्र मन वाला, धार्मिक हुआ ।३४। उस नगरी के निवासियों को धर्म मे तत्पर देख कर लोभ,