भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

( २७२ ) कल्कि भगवान् बोले—ब्राह्मण के लिए निश्चित किये गये वे दश-सस्कार कौन-कौन से है ? किस विधान से ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना किया करतें है ? ॥४१॥ विष्णुयश बोले—हे पुत्र ! ब्राह्मण के द्वारा ब्राह्मणी मे गर्भाधान सस्कार आदि से सस्कृत, त्रिकाल सध्या एव सावित्री की पूजा और जप मे परायण, तपस्वी, सत्यवक्ता, धीर धर्मात्मा ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना विधि को भले प्रकार जानकर आनन्द मे निमग्न रहता हुआ सदैव इस सृष्टि क रक्षक होता है ॥४२-४३॥ भगवान् ने कहा-हे तात ! जो ब्राह्मण सम्पूर्ण विश्व का उद्धारक, साधुमार्ग-परायण, भगवान् विष्णु को उपासना द्वारा प्रसन्न करने वाला और तीनो लोको की कामना पूर्ण करने वाला है, वह ब्राह्मण कहाँ है ? ॥४४॥ कलिना बलिना धर्म घातिना द्विज पातिना । निराकृता धर्मरता गता वर्षान्तरान्तरम् ॥ ४५ ॥ ये स्वल्पतपसो विप्रा स्थिता कलियुगान्तरे । शिश्नोदरभृतोऽधर्मनिरता विरत क्रिया ॥ ४६ ॥ पापसारा दुराचारास्तेजोहीना कलाविह । आत्मान रक्षितु नैव शक्ता शूद्रस्य सेवका ॥ ४७ ॥ इति जनकवचो निशम्य कल्कि. कलिकुलनाशमनोऽ भिलाषजन्मा द्विजनिजवचनैस्तदोपनीतोगुरुकुलवासमुवास साधुनाथ. ॥ ४८ ॥ पिता बोले—धर्मघाती और ब्राह्मणो के हिंसक महाबली कलि के द्वारा पीडित हुये विप्र गण अन्य देश को चले गये ॥४५॥ स्वल्प तप वाले जो ब्राह्मण इस कलिकाल मे यहाँ स्थित रहे, वे सब शिश्नो- दर धर्मी होकर धर्म और कर्म से विरत हो गये ॥४६॥ पाप युक्त, दुराचारी एव तेज-रहित ब्राह्मण इस कलिकाल मे आत्म-रक्षा मे अशक्त एव शूद्रो के सेवक बन गये है ॥४७॥ पिता के यह वचन सुन कर कल्कि भगवान् ने कलि को नष्ट करने का निश्चय किया । ब्राह्मणो ने अपनी वाणी द्वारा उनका उपनयन सस्कार किया । और तब भगवान् कल्कि गुरुकुल में निवास हेतु गये ॥४८॥

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 19, कुल 259 में से · BharatKosha