कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम अध्याय-२ ] [ ३६१ कल्किजी के शस्त्रवारी वीरगण प्रतिभा के समान चेष्टाहीन तथा बलहीन होगए ।४१। फिर कल्किजी ने जब अपने बन्धु, जाति- बांधव और सुहृदो को मायारूपिणी अपनी पत्नी के द्वारा जीर्ण होते देखा तो वे उसके समक्ष पहुँचे ।४२। जैसे ही उन्होंने श्रीस्वरूपा अपनी उस प्रिया की ओर देखा, वैसे ही वह वरारोहा उनके देह मे प्रविष्ट हो गई ।४३। तब अपनी उस माता माया देवी को न देख कर सभी प्रमुख बौद्ध बल पौरुष से रहित होकर रुदन करने लगे ।४४। विस्मयाविष्टमनस क्व गतेयमथाब्रुवन् । कल्किः समालोकनेन समुत्थाप्य निजाञ्जनान् ।४५। निशतमसिमादाय म्लेच्छांहन्तु मनो दधे । सन्नद्ध तुरगारूढ दृढहस्तधृतत्सरुम् ।४६ धनुर्निषङ्गमनिश्श बाणजालप्रकाशितम् । धृतहस्ततुत्राणगोवाङ्गुलि वराजितम् ।४७। मेधोपर्य्युत्ताराम दशनस्वर्णबिन्दुकम् । किरीटकाटिविन्यस्त-मणिराजिविराजितम् ।४८। कामिनीनयनानन्दसन्दोहरसमन्दिरम् । विपक्षपक्षविक्षेपक्षिप्तस्रक्षकटाक्षकम् ।४६। निजभक्तजनोल्लास-सवासचरणाम्बुजम् । निरीक्ष्य कल्कि ते बौद्धास्तत्रसुर्धर्मनिन्दका ।५०। माया को न देख वे आश्चर्य चकित होकर परस्पर कहने लगे कि माया देवी कहाँ चली गई ? इधर कल्किजी ने अपनी सेना पर दृष्टि डाली यो यह स्वस्थ और सचेत हो गई तथा म्लेच्छो का सहार करने की इच्छा से कल्किजी तीक्ष्ण खग लेकर घोडे पर सवार हुए ।४५-४६। उस समय बाणो से परिपूर्ण तरकश श्रेष्ठ धनुष, कवच एव अगुलित्राण