कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयांश- प्रथम अध्याय ततः कल्किम्लेच्छगणान्करवालेन कालितान् । बाणैः सन्ताडितान्याननयद्यमसादनम् ।१। विशाखयूपोऽपि तया कविप्राज्ञसुमन्त्रका । गार्ग्यभाग्र्यविशालाद्या म्लेच्छान्निन्धुयमक्षयम् ।२। कपोतरोमा काकाक्ष काककृष्णादयोऽपरे । बौद्धा. शौद्धोदना याता युयुधु कल्किसैनिकै ।३। तेषा युद्धमभूद्धोर भयदं सर्वदेहिनाम् । भूतेशानन्दजनकं रुधिरारुणकर्द्दमम् ।४। गजाश्वरथसघाना पतता रुधिरस्रवैः । स्रवन्ती केशशैवाला वाजिग्राहा सुगाहिको ।५। सूतजी बोले--फिर कल्किजी ने कुछ म्लेच्छो को बाणो द्वारा बीध दिया और कुछ को तलवार से मार कर यम लोक मे भेज दिया ।१। विशाखयूपनरेश, कवि, प्राज्ञ, सुमन्त्रक, गर्ग्य, भर्ग्य और विशालादि ने भी उन म्लेच्छो को यमपुरी पठाया ।२। फिर कपोतरोमा, काकाक्ष, काककृष्ण और शुद्धोदन आदि बौद्ध योद्धागण कल्किक-सेना से युद्ध मे तत्पर हुए।३। उस घोर सग्राम को देख कर सभी प्राणी भयभीत हुए । रक्त युक्त लाल कीचड से रणभूमि ढक गई, यह देख कर भूतनाथ हर्षित हो उठे ।४। युद्धस्थल मे गिरे हुए हाथियो, अश्वो और रथियो के ३६३