कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० ] [ कल्कि पुराण और यशवान् ही मानता हूँ ॥ ३ । फिर वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पराशर, नारद, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रित, दुर्वासा, देवल, कण्व, वेद प्रमिति और अंगिरा आदि यह सब तथा अन्यान्य श्रेष्ठ व्रत वाले मुनिगण चन्द्र सूर्यवंश मे उत्पन्न, महा वीर्यवान एव तपोनिष्ठ राजा मरु और देवापि उनको सामने देख कर, जैसे प्रसन्न मनसे देवताओ ने महोदधि के तीर पर भगवान् विष्णु से कहा था, वैसे ही पापो का नाश करने वाले कल्किजी के प्रति बोले ॥४-७ ॥ जयाशेषजगन्नाथ ! विदिताखिलमानस ! । सृष्टिस्थितिलयाध्यक्ष ! परमात्मन्प्रसीद नः ॥८॥ कालकर्मगुणावास प्रसारितनिजक्रिय ! । ब्रह्मादिनुतपादाब्ज ! पद्मानाथ प्रसीद नः ॥६॥ इति तेषा वच श्रुत्वा कल्किः प्राह् जगत्पति । कावेतौ भवतामग्रे महासत्वौ तपस्विनौ ॥१०॥ कथमत्रागतौ स्तुत्वा गङ्गा मुदितमानसौ । का वा स्तुतिस्तु जाह्नव्या युवयोर्नामनी च के ॥११॥ तयोर्मरुः प्रमुदितः कृताञ्जलिपुटः कृती । आदावुवाच विनयी निजवंशानुकीर्त्तनम् ॥१२॥ मुनियो ने कहा - हे सर्व विजयी जगदीश ! हे सम्पूर्ण विश्व के जीवो के घट-घट के ज्ञाता ! हे सृष्टि स्थिति और प्रलय के स्वामिन् ! हे परमात्मदेव ! प्रसन्न होइये ॥८॥ हे पद्मा के पते ! काल, कर्म और गुण के आप ही आश्रय हैं । ब्रह्मादि देवता भी आपके ही चरणार- विन्दो की पूजा किया करते हैं । आप हम पर प्रसन्न होइये ॥ ६ ॥ मुनियो के यह वचन सुन कर कल्किजी ने उनसे कहा- हे मुनियो ! आपके आगे यह महान् बल सम्पन्न एवं तपस्वी कौन हैं ? ॥१०॥ गगाजी की स्तुति करके अत्यन्त प्रसन्न हृदय से यह यहाँ क्यो पधारे हैं ? यह किस कारण भगवती जान्हवी की स्तुति मे लगे हैं ? इनके नाम क्या-क्या हैं ? ॥११॥ तब वे दोनो मरु देवादि प्रसन्न हृदयसे हाथ