कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 259 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ ] कल्कि पुराण सुन्दर रूप वाली, हास्यवदना, वर की कामना करती हुई रावण की बहिन शूर्पणखा को आते देख कर लक्ष्मण जी को सकेत किया, जिसके अनुसार लक्ष्मण जी ने तीक्ष्ण तलवार से उस राक्षसी का रूप भ्रष्ट कर दिया ॥३४॥ फिर उन्होंने मार्ग मे एक दानव का मार कर, चौदह हजार सेना के अधिपति एव रावण के अनुगामी खरदूषण को सेना सहित नष्ट कर दिया । फिर सीता जी की इच्छा से स्वर्ण-मृग रूपी राक्षस को मार डाला ॥३५॥ ततो दशमुखस्त्वरस्तमभिवीक्ष्य राम रुषा व्रजन्तमन्तुलक्ष्मण जनकजा जहाराश्रमे । ततो रघुपतिः प्रिया दलकुटीरसस्थापिता न वोक्ष्य तु विमूर्च्छितो वह विलप्य सीतेति ताम् ॥३६॥ वने निजगणाश्रमे नगतले जले पल्वले विचित्य पतित खग पथि ददर्श सौमित्रिणा । जटायुवचनोत्ततो दशमुखाद्दता जानकी विविच्य कृतवान्मृते पितरि वत्कृत्य प्रभु ॥३७॥ प्रियाविरहकातराऽनुजपुर सरो राघवो धनुर्धरन्धरो हरिबल नवालापिनम् । ददर्श ऋषभाचलाद्रविजवालिराजानुज- प्रिय पवननन्दनं परिणतं हित प्रेषितम् ॥३८॥ फिर राम लक्ष्मण को गया हुआ देख कर रावण ने उनके आश्रम से अकेली सीताजी का हरण कर लिया । तदनन्तर श्रीराम ने वहाँ आकर जब सीता को न देखा, तब वे 'हा सीते' 'हा सीते' आदि शोक युक्त शब्दो मे विलाप करते हुए मूर्च्छा को प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥ फिर वे ऋषियो के आश्रम, पर्वतो की गुफा, जल और स्थल आदि विविध स्थानो मे सीताजी को ढू ढने लगे । आगे चलने पर उन्हें माग मे जटायु पडा मिला । उससे उन्हे सीता हरण का समाचार प्राप्त हुआ । जटायु के मरने पर उन्होंने अपने पिता के समान उसका