कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१६ रहे थे ।१६। फिर संसार विजेता महाबाहु कल्कि जी ने क्रोध में भर कर भल्लास्त्र के द्वारा विकोक का शिर छेदन कर दिया ।१७। महाबली विकोक मृत्यु को प्राप्त हो गया था । परन्तु जैसे ही उसके भाई कोक ने उसे देखा वैसे ही वह पुनर्जीवित हो गया । यह देखा कर सभी देव- गण और स्वयं कल्कि जी भी आश्चर्य करने लगे ।१८। प्रतिकर्तुर्गदापाणे कोकस्याप्यच्छिनच्छिरः । मृतं कोको विकोकस्य दृष्ट्वातारंसमुत्थित ।१९। पुनस्तौ मिलितौ तेन युयुधाते महाबलौ । कामरूपधरौ वीरौ कालमृत्यू इवापरौ ।२०। खड्गचर्मधरौ कल्कि प्रहरन्तौ पुनः पुनः । कल्किः क्रुधा तयोस्तद्वद्द्वाभ्यांशिरसी हृते ।२१। पुनर्लग्ने समालोक्य हरिश्चिन्तापरोऽभवत् । विसत्त्वत्वमथालोक्य तुरगस्तावताडयत् ।२२। कालकल्पौ दुराधर्षौ तुरगेणार्दितौ भृशम् । कल्केस्त जघ्नतुर्बाणैरमर्षताम्रलोचनौ ।२३। तयोर्भुजान्तर सोऽश्व क्रुधा समदशद्भृशम् । तौ तु प्रभिन्नास्थिभुजौ विशस्ताङ्गदकार्मुकौ ० पुच्छ जगृहतु सप्तेर्गोपुच्छ बालकाविव ॥२४। फिर कल्कि जी ने विकोक को पुनर्जीवित करने वाले गदापाणि कोक का ही रच्छेद कर दिया । इस प्रकार कोक मर गया, परन्तु जैसे ही उसे विकोक ने देखा, वैसे ही वह भी पुनर्जीवित हो उठा ।१९। तब इच्छानुसार रूप धारण मे समर्थ महाबली कोक-विकोक दोनो मिल कर कल्किजी के साथ दूसरे काल के समान घोर युद्ध करने लगे ।२०। वह खड्ग और ढाल धारण कर बारम्बार कल्किजी पर आघात करने लगे । तब कल्किजी ने अत्यन्त क्रोधित होकर उन दोनो के ही अपने बाणो से मस्तक उड़ा दिये ।२१। परन्तु, जब दोनो के ही मस्तक अपने- अपने धड मे स्वय जुड गये, तब तो कल्कि जी को बडी चिन्ता हुई । फिर वे कोक-विकोक द्वारा अपने पर प्रहार होते देख कर स्वयं भी