कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ ] [ कल्कि पुराण
प्रकार रणक्षेत्र मे सब ओर से शूल, प्रास, गदा, बाण, शक्ति, यष्टि, तोमर, भाले, खड्ग, भुशु डी और कुन्त आदि अस्त्र-शस्त्र चलने लगे ।२३। उस समय छत्र, चमर, ध्वजा, पताका आदि की छाया और बहुत धूल उडने से रणभूमि मे अन्धकार छा गया ।२४। गगनेऽजुघना देवा केवा वास न चक्रिरे । गन्धर्वे साधुसन्दभैर्गायन्तैरमृतायनै. ।२५। द्रष्टु समागता, सर्वे लोका, समरमद्भुतम् । शखदुन्दुभिसन्नादैरास्फोटैर्बृं हितैरपि ।।२६ ह्रेषितैर्योधनोत्कृष्टैर्लोकावमूका इभवन् । रथिनो रथिभि साक पदात्राश्च पदातिभि ।।२७।। हया हयैरैभाश्चेभै समरोऽमरदानवै । यथामवत्स तु घनो यमराष्ट्रविवर्द्धन २८।। शशिध्वजचमूनाथै कल्किसेनाधिप सह । निपेतु सैनिका भूमौ छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धराः ।२६।। धावन्तोऽतिब्रुवन्तश्च विकुर्वन्तोऽसृगुक्षिता । उपर्युपरि सच्छन्ना गजाश्वरथमर्दिताः ।।३०।। गगन मण्डल मे स्थित हुए देवगण इस सग्राम को देख रहे थे । गधर्व भी अमृत-ध्वनि मे गाते हुए उस युद्ध को देखने के लिए आ गये थे ।२५। सभी लोक उम अद्भुत सग्राम को देखने के उद्देश्य से वहाँ आ गये थे । शख और नक्कारे बज रहे थे । परस्पर धौल मारने से, हाथियो की चिघाड से, अश्वो के हिनहिनाने से तथा शस्त्रास्त्रो के टक- राने से जो शब्द निकल रहे थे, उनके मिलने से रणभूमि गूँज रही थी । सभी लोक मूक जैसे लग रहे थे, क्योकि किसी को किसी की बात सुनाई नही देती थी, रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुडसवार घुडसवार से भिड रहे थे । देवासुर-सग्राम के समान भीषण यह युद्ध यमराष्ट्र की वृद्धि कर रहा था ।२६-२८ । कल्किजी के सेनापतियो से भिडे हुए शंशिध्वज के सेनापति एवं वीरगण शिर कटा कर पृथिवी पर गिर रहे थे ।२६।