भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

पञ्चदश अध्याय-३ ] [ ४६६ माया स्तव को सुनो । ३। शुकदेव जी बोले - विष्णु भक्त महाराज शशि- ध्वज ने जब अपने भल्लाटनगर को छोड़ कर संसार से विमुख होने के उद्देश्य से माया-स्तव किया ।४। शशिध्वज बोले- हे, ह्रींकार मयी, सत्यसार रूपिणी, विशुद्धा मायादेवी ! आप ब्रह्मादि देवताओ की जननी हैं। वेद भी आपकी महिमा का वखान करते हैं। समस्त भूतगण और तन्मात्राएं आपकी कोख मे स्थित रहते है । आप देव, गंधर्व और सिद्धगणो से वन्दित, सूक्ष्म स्वरूप तथा स्वाहा रूपिणी हैं, मैं आपकी वन्दना करता हूँ ।५। लोकातीतां द्वैतभूतां समीडे भूतैर्भंव्या व्याससामासिकाद्यैः विद्वद्गीता कालकल्लोललोला लीलापाङ्गक्षिप्तसंसारदुर्गाम् ।३। पूर्णा प्राप्या द्वैतलभ्या शरण्यामाद्ये शेषे मध्यतो या विभाति नानारूपैर्देवतिर्यङ्मनुष्यैस्तामाधारा ब्रह्मरूपा नमामि ।७। यस्या भासा त्रिजगद्भाति भूतैर्न भात्येतत्तदभावे विधातुः । कालोदेवकर्म चोपाधयो ये तस्या भाषा ताँ विशिष्टां नमामि भूमौ गन्धो रसताप्सु प्रतिष्ठा रूप तेजस्येव वायौ स्पृशत्वम् । खे शब्दो वा यच्चिदाभास्ति नाना मताभ्येताविश्वरूपा नमामि ।६। सावित्री त्व ब्रह्मरूपा भवानी भूतेशस्य श्रीपतेः श्रीस्वरूपा । शचीशक्रस्यापि नाकेश्वरस्य पत्नी श्रेष्ठा भासि माये जगत्सु माप लोको से परे, द्वैतभूता, भव्या तथा व्यासादि ऋषियों के द्वारा वन्दिता हैं। भगवान् विष्णु भी आपका स्तोत्र करते हैं। आप काल की लहरो में लहराती रहती हैं। सभी जीव आपकी विलास लीला में पडते हैं । ऐसी आप संसार दुर्ग से तारने वाली को नमस्कार करता हूँ ।६। सृष्टि के आदि, मध्य और लय काल मे आप ही स्थित रहती हो । आप सब की आश्रयदाता को पूर्ण भाव या द्वैतभाव से ही पाया जा सकता है। देवता, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियो मे आप ही वक्त होकर प्रकाशित है। आप संसार की आश्रयभूता एव ब्रह्म-